तिरंगे का सफर! कैसा था भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज, 120 वर्षों में कितनी बार बदला देश का झंडा?

देश के वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज का यह रूप रातोंरात नहीं बना. तिरंगे को 1906 से 1947 तक की लंबी यात्रा में स्वतंत्रता संग्राम के उतार-चढ़ावों ने इसे निखारा. 1947 में वर्तमान तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर मान्यता मिली.

India first national flag

भारत का तिरंगा सिर्फ 3 रंगो और एक अशोक चक्र वाला कपड़े का टुकड़ा नहीं है, बल्कि ये आजादी के संघर्ष, एकता के प्रतीक और गणतंत्र के अभिमान की निशानी है. यह हमें उन बलिदानों की याद दिलाता है, जब लाखों देशभक्तों ने भारत मां की सुरक्षा के लिए अपनी जान गंवा दी. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि देश के वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज का यह रूप रातोंरात नहीं बना. तिरंगे को 1906 से 1947 तक की लंबी यात्रा में स्वतंत्रता संग्राम के उतार-चढ़ावों ने इसे निखारा. आधिकारिक रूप से संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को वर्तमान तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया, लेकिन तब तक यह छह बार बदला गया.

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120 वर्षों में 6 बार बदला ध्वज का स्वरूप

1906 का ध्वज
स्वदेशी आंदोलन के दौरान कोलकाता के पारसी बागान स्क्वायर (वर्तमान ग्रीन पार्क) में पहली बार भारतीय ध्वज फहराया गया. इसमें तीन पट्टियां थीं ऊपर हरा, बीच में पीला, नीचे लाल. पीले भाग में आठ कमल पुष्प बने थे, जबकि बाएं कोने में चंद्रोदय के साथ सूर्य की आकृति थी. यह ध्वज भारतीय एकता और स्वाभिमान का पहला प्रतीक बना.

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1907 का ध्वज
पेरिस में मैडम भीकाजी कामा ने भारतीय प्रवासियों के साथ नया झंडा तैयार किया. इसमें केसरिया, हरा और लाल पट्टियां थीं. सबसे ऊपर ‘वंदे मातरम्’ लिखा गया. यह ध्वज अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्वतंत्रता की आवाज बनकर उभरा, जिसे जर्मनी के स्टुटगार्ट सम्मेलन में फहराया गया.

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1917 का ध्वज
होमरूल लीग के नेतृत्व में एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक ने इसे अपनाया. ब्रिटिश यूनियन जैक के साथ सात तारे, चंद्र-सूर्य चिह्न युक्त यह ध्वज स्वशासन की मांग को दर्शाता था. तिलक का उत्तर प्रदेश से गहरा जुड़ाव रहा, जहां उनकी गतिविधियों ने जनजागरण को गति दी.

1921 का ध्वज
पिंगली वेंकय्या द्वारा डिजाइन यह ध्वज महात्मा गांधी को प्रस्तुत किया गया. केसरिया, सफेद, हरे रंग की पट्टियों के बीच चरखा बनाया गया था. गांधीजी ने इसे सभी वर्गों हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख का प्रतिनिधित्व मानकर अपनी सहमती दी. स्वदेशी भावना का यह प्रतीक असहयोग आंदोलन का प्रमुख चिह्न बना.

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1931 का ध्वज
कराची अधिवेशन में कांग्रेस ने इसे आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज घोषित किया. केसरिया, सफेद, हरे रंग की पट्टियों के बीच नीला चरखा था. यह स्वराज की दृढ़ मांग बन गया, जो आजादी की ओर बढ़ते कदमों का संदेश देता था.

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1947 का वर्तमान तिरंगा
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने डॉ. बीआर अंबेडकर की अध्यक्षता में वर्तमान स्वरूप को मंजूरी दी. चरखे की जगह अशोक स्तंभ के नीले चक्र को स्थान मिला, जिसमें 24 नाभियां प्रगति का प्रतीक हैं. डिजाइनर पिंगली वेंकय्या के योगदान को सलाम करते हुए यह ध्वज 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर प्रथम फहराया गया.

डिस्क्लेमर: यह प्रकाशित जानकारी सामान्य स्रोतों से संकलित है. News24 इसके तथ्यों की पूर्ण प्रामाणिकता या शत-प्रतिशत सटीकता की जिम्मेदारी नहीं लेता.

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लेखक के बारे में

Akarsh Shukla

Akarsh Shukla

आकर्ष शुक्ला न्यूज 24 के साथ बतौर चीफ सब एडिटर जुड़े हुए हैं. मूल रूप से नोएडा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले आकर्ष ने पत्रकारिता का सफर 2016 में प्रिंट मीडिया से शुरू हुआ, बाद में उन्होंने डिजिटल मीडिया का रुख किया. आकर्ष शुक्ला ने गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री हासिल की. आकर्ष ने दिल्ली के अखबार वूमेन एक्सप्रेस में काम किया. इसके बाद नवोदय टाइम्स, ओपेरा न्यूज, वनइंडिया, इंडिया डॉट कॉम (जी मीडिया ग्रुप) में विभिन्न पदों पर कार्य किया. आकर्ष शुक्ला अक्टूबर, 2025 से न्यूज24 से जुड़े हुए हैं, जहां वो मुख्य रूप से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय और राजनीति से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं. इसके साथ ही आकर्ष शिफ्ट हेड के तौर पर टीम का नेतृत्व भी करते हैं. आकर्ष ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अलावा संसद से जुड़ी खबरों को कवर किया है. उनकी राजनीति में गहरी रुचि है, इस कारण वह राजनीति से जुड़ी खबरों को आसान शब्दों में लिखने में माहिर हैं. डिग्री और डिप्लोमा: आकर्ष शुक्ला ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक (BA) की डिग्री के बाद गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. आकर्ष शुक्ला ने DICS इंस्टीट्यूट से कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में 2 साल का डिप्लोमा भी किया है. पत्रकारिता में अनुभव: 10 वर्ष से अधिक
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