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इस खबर से जुड़ी मुख्य जानकारियां:
  • रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत के ढीले जल प्रबंधन और बिखरी नीतियों के कारण बड़े जल संकट की चेतावनी दी है.
  • भारत के कुल मीठे पानी का 80 फीसदी हिस्सा कृषि में जाता है, जहां सब्सिडी के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है.
  • तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर्स और एआई इंडस्ट्री में सर्वर कूलिंग के लिए पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है.
  • मुंबई के जलाशयों में सिर्फ 9.33 प्रतिशत स्टॉक बचा है, जिससे वहां केवल एक महीने की जरूरत पूरी हो सकती है.
  • दिल्ली में पानी का उत्पादन सामान्य से 50 एमजीडी कम होने से कई इलाकों में पिछले 15-20 दिनों से किल्लत है.

India Water Crisis: ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज रेटिंग्स ने भारत में गहराते जल संकट को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली चेतावनी जारी की है. मूडीज के मुताबिक, भारत की जल प्रबंधन व्यवस्था काफी बिखरी हुई है, जिसके कारण आने वाले समय में देश की आर्थिक रफ्तार और करोड़ों लोगों की जिंदगी पर बड़ा संकट मंडरा सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न क्षेत्रों के बीच पानी के बंटवारे की सुस्त प्रक्रिया और चुनिंदा सेक्टर्स को मिलने वाली भारी सब्सिडी इस समस्या को और गंभीर बना रही है. इससे सरकारी खजाने पर भी राजकोषीय दबाव तेजी से बढ़ रहा है.

खेती के साथ-साथ डिजिटल इंडस्ट्री के कारण बढ़ा पानी पर दबाव

भारत में उपलब्ध मीठे पानी का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होता है, जहां पानी और बिजली पर मिलने वाली छूट से भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है. इसके अलावा, देश में तेजी से बढ़ रही डिजिटल अर्थव्यवस्था, जैसे डेटा सेंटर्स, क्लाउड कंप्यूटिंग और एआई (AI) उद्योगों के कारण भी पानी की खपत बहुत ज्यादा बढ़ गई है. इन हाई-टेक सेंटर्स में सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है. ऐसे में सीमित संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.

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यह भी पढ़ें: कैसी होगी भारत की वो सीक्रेट टनल, जिसका नाम सुनते ही कांपेगा पाकिस्तान; जानिए क्या है पड़ोसी का डर

मुंबई में बचा एक महीने का पानी, दिल्ली और चेन्नई में भी हाहाकार

देश के प्रमुख महानगरों में जल संकट अब धरातल पर दिखने लगा है. आर्थिक राजधानी मुंबई को पानी सप्लाई करने वाले सात प्रमुख जलाशयों में जल स्तर गिरकर महज 9.33 प्रतिशत रह गया है, जो सिर्फ एक महीने के लिए काफी है. देश की राजधानी दिल्ली में भी पानी का उत्पादन सामान्य से 50 एमजीडी कम हो चुका है, जिससे कई इलाकों में हफ्तों से पानी नहीं आ रहा है. वहीं, चेन्नई के जलाशयों में भले ही अभी 9-10 महीने का पानी सुरक्षित हो, लेकिन वहां तेजी से गिरता भूजल स्तर और बढ़ती औद्योगिक मांग भविष्य के लिए बड़ा खतरा है.

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बदलते मौसम और ढीले मैनेजमेंट ने बढ़ाईं देश की मुश्किलें

जल प्रबंधन का जिम्मा मुख्य रूप से राज्यों के पास होने से हर राज्य की नीतियां अलग हैं, जिससे संकट के समय पानी का सही पुनर्वितरण नहीं हो पाता है. पाइपलाइन नेटवर्क की कमियां, भीषण सूखा, बाढ़, अनियमित मानसून और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां इस समस्या को और ज्यादा हवा दे रही हैं. मूडीज ने साफ किया है कि जल संकट का सीधा असर देश की वित्तीय और आर्थिक स्थिरता पर पड़ेगा. इसलिए भारत को बढ़ती आबादी और औद्योगिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाने के लिए तुरंत एक दीर्घकालिक नीति अपनानी होगी.

बेहतर जल प्रबंधन और सुधार:

  • समय रहते जल वितरण व्यवस्था दुरुस्त करने से दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों को भविष्य के भीषण जल संकट से बचाया जा सकेगा.
  • पानी और बिजली सब्सिडी के तार्किक रेगुलेशन से देश के गिरते भूजल स्तर को सुधारा जा सकता है और सरकारी खजाने पर बोझ कम होगा.
  • आधुनिक पाइपलाइन नेटवर्क तैयार करने से पानी की बर्बादी रुकेगी, जिससे अंतिम छोर पर बैठे नागरिक तक पीने का साफ पानी पहुंचेगा.
  • संतुलित जल नीति अपनाने से डिजिटल इकोनॉमी, डेटा सेंटर्स और उद्योगों को बिना रुकावट पानी मिलेगा, जिससे आर्थिक ग्रोथ जारी रहेगी.
  • वर्षा जल संचयन (रेन वॉटर हार्वेस्टिंग) को बढ़ावा देने से चेन्नई जैसे शहरों में सूखे और अनियमित मानसून के खतरों को कम किया जा सकेगा.
First published on: Jun 23, 2026 05:21 PM

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Raja Alam

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