गुजरात से एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक पुलिस कांस्टेबल अपने ऊपर लगे 20 रुपये की रिश्वत लेने के काले दाग को मिटाने के लिए करीब 30 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी. उनकी मेहनत रंग लाई और हाई कोर्ट ने उन्हें इस मामले में बाइज्जत बरी कर दिया.
इस मामले में आगे की कहानी सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे. दरअसल, उनकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. क्योंकि अपने ऊपर लगे दाग को मिटाने की खुशी ज्यादा देर तक उनके हिस्से आई ही नहीं. बता दें कि एक दिन बाद ही नींद में ही उनकी मौत हो गई.
वहीं, इस पूरे मामले में खास बात ये भी थी कि हाई कोर्ट द्वारा 4 फरवरी को दिए गए फैसले में उनके बेगुनाह साबित होने के बाद उन्होंने अपने वकील से कहा था, 'मेरी जिंदगी से ये कलंक हट गया है, अब अगर भगवान मुझे उठा भी ले, तो कोई दुख नहीं होगा.'
1996 में क्या हुआ था?
बता दें कि यह मामला 20 नवंबर, 1996 को शुरू हुआ था. जब कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति सहित वेजलपुर पुलिस स्टेशन में तैनात दो अन्य कांस्टेबलों पर ट्रक ड्राइवरों से 20-20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा था. ये आरोप भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगाए गए थे.
1997 में एक सेशंस कोर्ट में उनके खिलाफ चार्जशीट दायर की गई. 2002 में आरोप तय किए गए. 2003 में गवाहों की सुनवाई शुरू हुई, और 2004 में सेशंस कोर्ट ने प्रजापति को चार साल जेल और 3,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई.
एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा दर्ज किए गए मामले के अनुसार, वह गाड़ियों को शहर में अवैध रूप से घुसने देने के बदले ट्रक ड्राइवरों से 20 रुपये की रिश्वत ले रहे थे. जिसके बाद पूरी प्लानिंग के साथ जाल बिछा कर एसीबी ने तीनों को पकड़ा था और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था. उस समय प्रजापति की उम्र करीब 34 साल थी और वह अहमदाबाद में रहते थे, लेकिन बाद में वह पाटण जिले में शिफ्ट हो गए थे और वहीं से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे.
ट्रायल कोर्ट ने माना था दोषी और सुनाई थी सजा
प्रजापति के अलावा इस मामले में दो अन्य कांस्टेबलों सेवनकुमार राठवा और नसरूल्लाह खान पर भी पैसे लेने का मामला दर्ज किया गया था. इसके बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई अगले 30 सालों तक ऐसे ही चलती रही. सबसे पहले अहमदाबाद की ट्रायल कोर्ट में मामला चला, जहां हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने साल 2004 में तीनों को दोषी ठहराते हुए उन्हें 4-4 साल की कैद की सजा सुनाई. इसके साथ ही कोर्ट ने 3-3 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था. जिसके चलते इन तीनों पुलिसकर्मियों नौकरी भी चली गई थी.
गुजरात हाईकोर्ट में दी सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती
प्रजापति ने गुजरात हाई कोर्ट में सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती दी. इसके बाद, उनकी अपील 22 साल तक पेंडिंग रही - जब तक कि इस साल 4 फरवरी को यह फैसला नहीं आया कि वह निर्दोष हैं.
कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे और प्रॉसिक्यूशन आरोप साबित करने में नाकाम रहा. प्रजापति का केस लड़ने वाले वकील नितिन गांधी ने हाई कोर्ट को बताया कि पूरा मामला शक पर आधारित था.
अब भगवान उठा भी ले तो…
वहीं, हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद, प्रजापति ने अपने वकील के ऑफिस में कहा,'मेरी जिंदगी से ये कलंक हट गया है, अब अगर भगवान मुझे उठा भी ले, तो कोई दुख नहीं होगा.' फिर वह घर लौट आए. इसके अगले ही दिन, उनकी नेचुरल कारणों से मौत हो गई.
उनके शुभचिंतकों ने कहा कि अगर वह थोड़ा और जीते तो उन्हें देखकर बहुत खुशी होती.
वकील ने कहा, 'जब वह कल ऑफिस आए थे, तो बहुत खुश थे क्योंकि उन्हें बरी कर दिया गया था.'
वकील ने कहा, 'मैंने उनसे कहा, 'अंकल, आपको सरकार से मिलने वाले सभी फायदों के लिए अप्लाई करना चाहिए'… मैंने अगले दिन उन्हें फिर से फोन किया, तो मुझे बताया गया कि उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गई है.'
गुजरात से एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक पुलिस कांस्टेबल अपने ऊपर लगे 20 रुपये की रिश्वत लेने के काले दाग को मिटाने के लिए करीब 30 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी. उनकी मेहनत रंग लाई और हाई कोर्ट ने उन्हें इस मामले में बाइज्जत बरी कर दिया.
इस मामले में आगे की कहानी सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे. दरअसल, उनकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. क्योंकि अपने ऊपर लगे दाग को मिटाने की खुशी ज्यादा देर तक उनके हिस्से आई ही नहीं. बता दें कि एक दिन बाद ही नींद में ही उनकी मौत हो गई.
वहीं, इस पूरे मामले में खास बात ये भी थी कि हाई कोर्ट द्वारा 4 फरवरी को दिए गए फैसले में उनके बेगुनाह साबित होने के बाद उन्होंने अपने वकील से कहा था, ‘मेरी जिंदगी से ये कलंक हट गया है, अब अगर भगवान मुझे उठा भी ले, तो कोई दुख नहीं होगा.’
1996 में क्या हुआ था?
बता दें कि यह मामला 20 नवंबर, 1996 को शुरू हुआ था. जब कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति सहित वेजलपुर पुलिस स्टेशन में तैनात दो अन्य कांस्टेबलों पर ट्रक ड्राइवरों से 20-20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा था. ये आरोप भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगाए गए थे.
1997 में एक सेशंस कोर्ट में उनके खिलाफ चार्जशीट दायर की गई. 2002 में आरोप तय किए गए. 2003 में गवाहों की सुनवाई शुरू हुई, और 2004 में सेशंस कोर्ट ने प्रजापति को चार साल जेल और 3,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई.
एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा दर्ज किए गए मामले के अनुसार, वह गाड़ियों को शहर में अवैध रूप से घुसने देने के बदले ट्रक ड्राइवरों से 20 रुपये की रिश्वत ले रहे थे. जिसके बाद पूरी प्लानिंग के साथ जाल बिछा कर एसीबी ने तीनों को पकड़ा था और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था. उस समय प्रजापति की उम्र करीब 34 साल थी और वह अहमदाबाद में रहते थे, लेकिन बाद में वह पाटण जिले में शिफ्ट हो गए थे और वहीं से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे.
ट्रायल कोर्ट ने माना था दोषी और सुनाई थी सजा
प्रजापति के अलावा इस मामले में दो अन्य कांस्टेबलों सेवनकुमार राठवा और नसरूल्लाह खान पर भी पैसे लेने का मामला दर्ज किया गया था. इसके बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई अगले 30 सालों तक ऐसे ही चलती रही. सबसे पहले अहमदाबाद की ट्रायल कोर्ट में मामला चला, जहां हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने साल 2004 में तीनों को दोषी ठहराते हुए उन्हें 4-4 साल की कैद की सजा सुनाई. इसके साथ ही कोर्ट ने 3-3 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था. जिसके चलते इन तीनों पुलिसकर्मियों नौकरी भी चली गई थी.
गुजरात हाईकोर्ट में दी सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती
प्रजापति ने गुजरात हाई कोर्ट में सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती दी. इसके बाद, उनकी अपील 22 साल तक पेंडिंग रही – जब तक कि इस साल 4 फरवरी को यह फैसला नहीं आया कि वह निर्दोष हैं.
कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे और प्रॉसिक्यूशन आरोप साबित करने में नाकाम रहा. प्रजापति का केस लड़ने वाले वकील नितिन गांधी ने हाई कोर्ट को बताया कि पूरा मामला शक पर आधारित था.
अब भगवान उठा भी ले तो…
वहीं, हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद, प्रजापति ने अपने वकील के ऑफिस में कहा,’मेरी जिंदगी से ये कलंक हट गया है, अब अगर भगवान मुझे उठा भी ले, तो कोई दुख नहीं होगा.’ फिर वह घर लौट आए. इसके अगले ही दिन, उनकी नेचुरल कारणों से मौत हो गई.
उनके शुभचिंतकों ने कहा कि अगर वह थोड़ा और जीते तो उन्हें देखकर बहुत खुशी होती.
वकील ने कहा, ‘जब वह कल ऑफिस आए थे, तो बहुत खुश थे क्योंकि उन्हें बरी कर दिया गया था.’
वकील ने कहा, ‘मैंने उनसे कहा, ‘अंकल, आपको सरकार से मिलने वाले सभी फायदों के लिए अप्लाई करना चाहिए’… मैंने अगले दिन उन्हें फिर से फोन किया, तो मुझे बताया गया कि उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गई है.’