E20 Petrol: केंद्र की 20% इथेनॉल ब्लेंडेट पेट्रोलपॉलिसी यानी ‘E20’ के खिलाफ कैंपेन शनिवार, 1 अगस्त को और तेज होने वाला है. आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल एक देशव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे और एक्टिविस्ट तहसीन पूनावाला दिल्ली में मौन भूख हड़ताल शुरू करेंगे.
केजरीवाल का बड़ा ऐलान
इस कार्यक्रम से पहले अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर ऐलान किया कि एक सेलिब्रिटी इस कैंपेन में शामिल होगी और E20 पॉलिसी पर चर्चा में हिस्सा लेगी. उन्होंने लोगों को नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में ‘E20 के खिलाफ नेशनल टाउन हॉल’ में शामिल होने या एक खास व्हाट्सएप रजिस्ट्रेशन लिंक के जरिए वर्चुअली जुड़ने के लिए इंवाइट किया.
कब शुरू हुआ कैंपेन?
केजरीवाल ने सबसे पहले 27 जुलाई 2026 को इस अभियान की शुरुआत की थी और केंद्र से इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम पर फिर से विचार करने की गुजारिश की. उन्होंने दावा किया कि कई व्हीकल ओनर्स ने कम माइलेज, ज्यादा मेंटेनेंस खर्च और इंजन की परफॉर्मेंस को लेकर चिंता जताई है. उन्होंने पीएम मोदी से भी अपील की कि वो लोगों की नाराजगी और बढ़ने से पहले इस मुद्दे पर ध्यान दें.
तहसीन पूनावाला करेंगे भूख हड़ताल
इस बीच तहसीन पूनावाला, जिन्होंने जुलाई में इस पॉलिसी के खिलाफ शुरुआती सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों में से एक को लीड किया था, ने ऐलान किया है कि वो गांधी स्मृति तक मार्च करेंगे और भूख हड़ताल के साथ मौन विरोध प्रदर्शन करेंगे. हालांकि उनके संगठन, ‘टीम भारत’ ने केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी से मुलाकात के बाद संसद मार्ग के पास प्रस्तावित मार्च को स्थगित कर दिया, लेकिन पूनावाला ने कहा कि वो अपना निजी विरोध जारी रखेंगे.
सरकार का पक्ष क्या है?
केंद्र का कहना है कि भले ही E20 ईंधन से माइलेज में थोड़ी कमी आ सकती है, लेकिन इससे वाहनों के इंजन को कोई नुकसान नहीं होता है. हालांकि कई एक्टिविस्ट, ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन और वाहन मालिकों ने इस पॉलिसी पर सवाल उठाए हैं. उनका आरोप है कि इससे फ्यूल इकॉनमी, इंजन की परफॉर्मेंस और मेंटेनेंस की लागत पर बुरा असर पड़ता है.
देशव्यापी मुद्दा
केंद्र सरकार का इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम अब राजनीतिक बहस का एक बड़ा विषय बन गया है. विपक्षी दलों, ट्रांसपोर्ट बॉडीज और सिविल सोसाइटी ग्रुप्स के अपने अभियान तेज करने के साथ, E20 का मुद्दा हाल की राष्ट्रीय नीतिगत बहसों में से एक के रूप में उभर रहा है, जिसमें इसके असर पर समर्थक और आलोचक अलग-अलग राय रख रहे हैं.
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