वर्षों से अधर में फंसी हाउसिंग परियोजनाओं के खरीदारों के लिए इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी IBC एक अहम रास्ता बनकर सामने आया है. IBC के तहत चल रही समाधान प्रक्रिया के जरिए देशभर में 1.4 लाख से अधिक होमबायर्स ऐसे हैं, जिन्हें उनके घर मिलने की उम्मीद जगी है. इनमें कई खरीदारों को उनके फ्लैट का कब्जा भी मिल चुका है. वित्तीय संकट से जूझ रहे डेवलपर्स की परियोजनाओं को अब आर्थिक रूप से मजबूत कंपनियां अपने हाथ में लेकर पूरा कर रही हैं.
84000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का हो चुका समाधान
इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों के मुताबिक, IBC के तहत अब तक रियल एस्टेट से जुड़े 553 मामले स्वीकार किए गए हैं. इन परियोजनाओं से करीब 2.5 लाख होमबायर्स जुड़े हुए हैं. इनमें लगभग 17 प्रतिशत मामलों का समाधान हो चुका है. वहीं, 221 मामलों में करीब 1.1 लाख खरीदार अब भी समाधान प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं. IBC के तहत जिन रियल एस्टेट परियोजनाओं का समाधान हुआ है, उनमें करीब 84,000 करोड़ रुपये का निवेश जुड़ा है. दूसरी ओर लगभग 65,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएं अभी भी समाधान प्रक्रिया में हैं.
साल 2018 में घर खरीदारों को IBC के तहत वित्तीय लेनदार का दर्जा दिए जाने के बाद यह कानून अटकी हुई हाउसिंग परियोजनाओं के समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है. इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया यानी IBBI ने हाल ही में रियल एस्टेट मामलों में सुधार को लेकर कई सुझाव दिए हैं. इनमें परियोजना स्तर पर इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया चलाने, परियोजना से आने वाले पैसे को अलग रखने, दावों की प्रक्रिया आसान बनाने और रेरा तथा इंसॉल्वेंसी अदालतों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया गया है. इसका मुख्य उद्देश्य परियोजनाओं को लिक्विडेशन में भेजने के बजाय उन्हें पूरा कराने पर ध्यान देना है.
कानूनी विवाद और देरी अब भी बड़ी चुनौती
हालांकि, IBC के जरिए समाधान की प्रक्रिया भी आसान नहीं है. कानूनी विवाद, अपील और अलग-अलग स्तरों पर चलने वाली कार्रवाई के कारण कई मामलों में परियोजनाओं को पूरा होने में लंबा समय लग रहा है. नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी NCLT से समाधान योजना को मंजूरी मिलने और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच का समय भी नए डेवलपर्स के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. सीबीआरई इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर-लैंड एंड कैपिटल मार्केट्स निखिल भाटिया के मुताबिक, रियल एस्टेट परियोजनाएं लंबे समय में पूरी होती हैं और इनमें होमबायर्स, बैंक, जमीन मालिकों समेत कई पक्षों के दावे जुड़े होते हैं. नए डेवलपर को शुरुआत में बड़ी पूंजी लगानी पड़ती है, जबकि उसका रिटर्न काफी बाद में मिलता है.
बड़े डेवलपर्स के लिए भी खुला नया रास्ता
नाइट फ्रैंक के गुलाम जिया के अनुसार, IBC के तहत बढ़ती संकटग्रस्त रियल एस्टेट संपत्तियां आर्थिक रूप से मजबूत डेवलपर्स के लिए विस्तार का अवसर भी पैदा कर रही हैं. रियल एस्टेट से जुड़े मामले सभी कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस यानी CIRP मामलों का करीब 22 प्रतिशत हैं. अदाणी, रिलायंस, जेएसडब्ल्यू और प्रेस्टीज जैसे बड़े समूहों ने भी संकटग्रस्त परियोजनाओं और रियल एस्टेट प्लेटफॉर्म में रुचि दिखाई है. इससे अटके हुए प्रोजेक्ट्स में नई पूंजी और निर्माण क्षमता पहुंचाने में मदद मिल रही है.
मुंबई का टेक टेन बीकेसी इसका एक उदाहरण है. मूल डेवलपर्स के वित्तीय संकट के बाद यह परियोजना 2020 में अटक गई थी. इससे 176 मूल म्हाडा परिवारों समेत बड़ी संख्या में खरीदार प्रभावित हुए. NCLT की प्रक्रिया के बाद अदाणी रियल्टी ने परियोजना अपने हाथ में ली और इसे पूरा करने के लिए 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की प्रतिबद्धता जताई. इसमें 400 करोड़ रुपये से ज्यादा की नई पूंजी शामिल थी. परियोजना के लिए करीब 1,200 करोड़ रुपये की निर्माण वित्त व्यवस्था भी जुटाई गई. इसके बाद 903 खरीदारों को उनके घर मिल चुके हैं.
इसी तरह बीकेसी के भारत नगर स्लम रिहैबिलिटेशन प्रोजेक्ट को भी अदाणी रियल्टी ने एचडीआईएल के पतन के बाद संभाला. परियोजना पर बकाया सरकारी देनदारियों और झुग्गी निवासियों के ट्रांजिट रेंट से जुड़े भुगतान लंबित थे. अब करीब 1,000 परिवारों के लिए पुनर्वास आवास का निर्माण फिर से शुरू हो चुका है. गुरुग्राम के हिल्स-77 प्रोजेक्ट के समाधान से 724 होमबायर्स को कब्जा मिला. वहीं सेंटर कोर्ट परियोजना, जिस पर करीब 1,250 करोड़ रुपये के दावे थे, इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के जरिए नए डेवलपर के पास गई और उसे ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट भी मिल चुका है. इससे 300 से अधिक खरीदारों को लाभ हुआ है.
रियल एस्टेट एक्सपर्ट विशाल भार्गव के मुताबिक, NCLT ने लंबे समय से अटकी परियोजनाओं के खरीदारों का भरोसा बहाल करने में भूमिका निभाई है. अदाणी और लोढ़ा जैसे बड़े डेवलपर्स द्वारा संकटग्रस्त परियोजनाओं को पूरा करने से कई मामलों में खरीदारों को लंबी कानूनी लड़ाई के बजाय अपने घर तक पहुंचने का रास्ता मिला है.
IBC का इस्तेमाल केवल आवासीय परियोजनाओं तक सीमित नहीं है. ओबेरॉय रियल्टी के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम ने मुंबई के होटल होराइजन को अपने नियंत्रण में लिया, जबकि मैक्रोटेक डेवलपर्स ने इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के जरिए वी होटल्स का अधिग्रहण किया. इससे पता चलता है कि इंसॉल्वेंसी व्यवस्था अब संकटग्रस्त रियल एस्टेट संपत्तियों को दोबारा सक्रिय करने के साथ-साथ डेवलपर्स के लिए नए अधिग्रहण का माध्यम भी बन रही है.
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