सुपरपावर अमेरिका की राजनीति में एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया है. अमेरिकी मिडटर्म (मध्यावधि) चुनावों के जो नतीजे सामने आए हैं, उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं. इन नतीजों के बाद अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के दोनों सदनों पर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी का कब्जा हो गया है. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के बाद अब सीनेट में भी डेमोक्रेट्स ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है, जबकि चुनाव से पहले दोनों सदनों पर रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण था. अमेरिका की इस राजनीतिक उठापटक का भारत की विदेश नीति, ट्रेड डील (व्यापार समझौता), कश्मीर और H-1B वीजा पर क्या असर पड़ेगा?
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर क्या होगा असर?
भारत और अमेरिका के बीच फरवरी में हुए अंतरिम समझौते के तहत भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करने पर बात हुई थी, बदले में भारत की ओर से रूसी तेल की खरीद रोकने का वादा था, जो फिलहाल अटका हुआ है.
विशेषज्ञों का कहना है कि नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (IIPA) के रजिस्ट्रार अमिताभ रंजन के मुताबिक, अमेरिका टैरिफ को 18% पर तो रखना चाहता है लेकिन इस पर हस्ताक्षर करने से बच रहा है. क्योंकि अब अमेरिकी संसद में ट्रंप कमजोर पड़े हैं, ऐसे में नई दिल्ली के पास भारत के पक्ष में बेहतर शर्तों और मोलभाव करने का एक शानदार मौका हो सकता है.
रक्षा और रणनीतिक साझेदारी पर कोई आंच नहीं
अमेरिकी विदेश नीति मुख्य रूप से वाइट हाउस से चलाई जाती है, जिसमें कांग्रेस की भूमिका सीमित होती है. सबसे अच्छी बात ये है कि कि भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी को वहां की दोनों ही प्रमुख पार्टियों यानी रिपब्लिकन और डेमोक्रेट का मजबूत समर्थन हासिल है. इसलिए रक्षा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आपसी सहयोग पहले की तरह ही मजबूत बना रहेगा.
कश्मीर मुद्दे पर क्या बदल सकता है?
ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका ने आमतौर पर कश्मीर के मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी थी, यहां तक कि अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कश्मीर का दौरा कर भारत के पक्ष में बयान भी दिया था. हालांकि, डेमोक्रेट्स का झुकाव अक्सर मानवाधिकार और कश्मीर के मुद्दों पर तीखे सवाल पूछने का रहा है. हाउस में डेमोक्रेट्स का दबदबा बढ़ने से इस पर कुछ नई बहस या प्रस्ताव देखने को मिल सकते हैं, जो भारत के लिए थोड़े असहज हो सकते हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसका असर केवल प्रतीकात्मक ही रहेगा.
ईरान युद्ध और कच्चे तेल की कीमतें
मिडटर्म चुनावों में हार के बाद राष्ट्रपति ट्रंप के लिए ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख जारी रखना आसान नहीं होगा. अगर इस युद्ध में नरमी आती है या कोई समाधान निकलता है, तो इसका सीधा फायदा वैश्विक ऊर्जा बाजार को मिलेगा. युद्धविराम होने से कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे भारत जैसे देश को बहुत बड़ी राहत मिलेगी.
H-1B वीजा और इमिग्रेशन नियमों पर असर
अमेरिका में नौकरी कर रहे लाखों भारतीयों और खासतौर पर H-1B वीजा धारकों के मन में यह सवाल है कि इस हार से क्या बदलेगा? एक्सपर्ट्स का मानना है कि संसद में सत्ता समीकरण बदलने से कड़े इमिग्रेशन कानूनों के पास होने की संभावना अब काफी कम हो जाएगी. हालांकि, कांग्रेस की तरफ से वीजा नियमों की जांच बढ़ सकती है, लेकिन इससे ट्रंप के पुराने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर अपने आप रद्द नहीं होंगे.
अमेरिका के मिडटर्म चुनावों के इन नतीजों ने राष्ट्रपति ट्रंप की ताकत को जरूर सीमित किया है, लेकिन भारत के साथ रणनीतिक रिश्तों पर इसका कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा. बल्कि ट्रेड डील और तेल की कीमतों के मोर्चे पर भारत के लिए कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं.