---विज्ञापन---

बिजनेस

Budget Expectation 2026 : क्या यह केवल लेखा-जोखा होगा या भारत की दिशा बदलने का साहस?

डॉ. विजय कुमार चोपड़ा (चार्टर्ड अकाउंटेंट्स) ने बजट 2026 पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हर साल “रोजगार” शब्द बजट भाषण में आता है, लेकिन जमीन पर असर सीमित रहता है.

Author Edited By : Bhawna Dubey
Updated: Jan 29, 2026 15:25

हर साल बजट आता है, भाषण होते हैं, आंकड़े गिनाए जाते हैं और कुछ दिनों बाद बहस ठंडी पड़ जाती है. लेकिन इस बार सवाल सामान्य नहीं है. सवाल सीधा है—
क्या आगामी बजट भारत की जमीनी हकीकत को बदलेगा या केवल फाइलों में संतुलन साधकर निकल जाएगा?

आज भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन इसी भारत में आम आदमी की जेब सिकुड़ रही है, छोटे व्यापारी हांफ रहे हैं और युवा डिग्रियों के बावजूद रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं. ऐसे में बजट से अपेक्षा “वाहवाही” की नहीं, हिम्मत की है.

---विज्ञापन---

दशा की सच्चाई : आंकड़ों से परे भारत

सरकारी दावे विकास के हैं, लेकिन जमीनी सच यह है कि
• महंगाई अब केवल गरीबों की समस्या नहीं रही
• मध्यम वर्ग कर देता है, पर राहत नहीं पाता
• MSME और छोटे कारोबारी नियमों और टैक्स के बोझ से दबे हैं

यदि बजट में आम आदमी को सीधे राहत नहीं मिली, तो विकास की सारी बातें खोखली लगेंगी. सवाल यह नहीं कि GDP कितनी बढ़ेगी, सवाल यह है कि घर का बजट संभलेगा या नहीं.

---विज्ञापन---

यह भी पढ़ें;Gold Silver Rate Today : रात को ग‍िरने के बाद फ‍िर चढ़ा सोने चांदी का रेट, जानें आज का भाव

रोजगार : हर बजट की सबसे बड़ी नाकामी

हर साल “रोजगार” शब्द बजट भाषण में आता है, लेकिन जमीन पर असर सीमित रहता है. युवा भारत आज भी पूछ रहा है—
नौकरी कहां है?

यदि आगामी बजट भी इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्ट-अप के नाम पर केवल बड़े उद्योगों तक सीमित रहा, और स्किल-आधारित, स्थानीय रोजगार पर ठोस निवेश नहीं हुआ, तो यह एक और खोया हुआ अवसर होगा.

दिशा का सवाल : आत्मनिर्भर या आयात-निर्भर?

आत्मनिर्भर भारत का नारा तब तक अधूरा है, जब तक:
• छोटे उद्योग सशक्त न हों
• घरेलू उत्पादन को वास्तविक संरक्षण न मिले
• नीति स्थिरता और टैक्स स्पष्टता न हो

बजट को तय करना होगा—
क्या भारत केवल उपभोक्ता बना रहेगा या निर्माता राष्ट्र बनेगा?

किसान, गांव और हाशिये का भारत

हर बजट में किसान का नाम लिया जाता है, लेकिन संकट जस का तस रहता है. MSP, सिंचाई, भंडारण और ग्रामीण रोजगार—इन पर ठोस खर्च के बिना समावेशी विकास एक नारा भर है.
भारत की दिशा दिल्ली से नहीं, गांव से तय होती है.

राजकोषीय अनुशासन बनाम राजनीतिक लोकलुभावनता

घाटा नियंत्रित करना जरूरी है, लेकिन सवाल यह है—
क्या सरकार खर्च घटाकर विकास रोकेगी या खर्च की गुणवत्ता सुधारेगी?

पूंजीगत निवेश बढ़ाकर, गैर-जरूरी खर्च घटाकर और टैक्स सिस्टम सरल बनाकर ही भरोसेमंद अर्थव्यवस्था खड़ी हो सकती है.

निष्कर्ष : यह बजट याद रखा जाएगा—या भुला दिया जाएगा?

आगामी बजट के सामने स्पष्ट विकल्प है—
• या तो वह सुरक्षित, संतुलित और औसत रहेगा
• या फिर साहसी, निर्णायक और परिवर्तनकारी बनेगा

देश को इस समय सावधान नहीं, साहसी बजट चाहिए.
ऐसा बजट जो सिर्फ बाजार को नहीं, आम नागरिक को भी यह भरोसा दे कि देश सही दिशा में जा रहा है.

यह भी पढ़ें;Budget Expectation 2026: ग्रीन इकॉनमी के लिए रीसाइक्लेबल कचरे पर GST में राहत देने की मांग

इतिहास वही बजट याद रखता है जो आंकड़ों से आगे जाकर देश की सोच बदलते हैं.

अब देखना यह है कि आने वाला बजट
भारत की दशा पर मरहम रखेगा—या दिशा बदलने की हिम्मत दिखाएगा.

First published on: Jan 29, 2026 03:25 PM

संबंधित खबरें

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.