विविधता में एकता और प्रयोगधर्मी भारत के लोगों ने पहली बार लाल किला की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंह से ‘दिमागी नक्सल’ का जिक्र सुना. खेतों में काम करने वाले किसान से लेकर कारखानों में काम करने वाले मजदूर तक, यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले प्रोफेसर से लेकर राजनेता तक अपने-अपने हिसाब से दिमागी नक्सल के मायने निकालने और समझने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि आखिर पीएम मोदी ने दिमागी नक्सल का जिक्र क्यों किया? हमारे सामाजिक ताने-बाने में आखिर ‘दिमागी नक्सल’ कौन है? ये किस तरह के लोग होते हैं? चाहते क्या हैं? किस तरह की बातें करते हैं? दिमागी नक्सल हमारे सामाजिक ताने-बाने और लोकतंत्र के लिए फायदेमंद हैं या हानिकारक? नक्सलवाद शब्द का जिक्र आते ही आपके जेहन में आते ही कौन सी तस्वीर सामने आती है. संभवत: घना जंगल, बंदूक, बारूदी सुरंग, गुरिल्ला युद्ध और लाल झंडा. सरकारी दावों के मुताबिक, भारत में नक्सलवाद अब इतिहास बन चुका है. लेकिन, क्या नक्सलवाद की कहानी सिर्फ बंदूक की कहानी है? अगर बंदूक दिखाई देने वाला चेहरा है तो उसके पीछे कौन-सा विचार है? अगर बंदूक का दौर खत्म होने का दावा किया जा रहा है तो क्या विचार भी खत्म हो गया? आज ये सवाल इसलिए और ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को कहा कि हथियारी नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नक्सलवाद की बहस अब घने जंगलों से निकलकर दिमाग तक पहुंच गयी है? क्या सत्ता प्रतिष्ठान की सोच और नीतियों से इतर बात करने वाला शख्स दिमागी नक्सल है? आखिर, विचार और बंदूक के बीच किस तरह का रिश्ता है? सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले पत्रकार, विद्यार्थी, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ताओं को किस तरह से देखा जाना चाहिए? क्या विचार की लड़ाई विचार की जगह दिमागी नक्सल वाले लेबल में नहीं बदल जाएगी?
नक्सलवाद को समझना है तो शुरुआत बंदूक से नहीं विचार से करनी होगी. दुनिया में हर बड़ी क्रांति के पीछे कोई न कोई विचार रहा है. उस विचार के पीछे एक बेचैनी होती है - जो मौजूदा व्यवस्था को बदलना चाहती है. रूस की क्रांति को देखिए, लेनिन की विचारधारा को देखिए, चीन में माओ के लॉन्ग मार्च को देखिए, जहां सबसे पहले एक विचार आया, फिर उस विचार ने सत्ता को चुनौती देने का रास्ता खोजा. कहीं वह रास्ता राजनीतिक था, कहीं हिंसक और कहीं गुरिल्ला युद्ध तक पहुंचा. माओ के लिए गुरिल्ला युद्ध सिर्फ लड़ाई की एक तकनीक नहीं था, क्रांतिकारी रणनीति का एक अहम हिस्सा था. एक कमजोर ताकत सीधे राज्य से टकराकर जीत नहीं सकती, इसलिए वह लंबे संघर्ष का रास्ता अपनाती है, गांवों में आधार बनाती है, संगठन तैयार करती है और धीरे-धीरे सत्ता को चुनौती देती है. मतलब, वहां विचार और हथियार एक-दूसरे से जुड़े हुए थे. विचार अपना निशाना तय करता था और हथियार उस निशाने तक पहुंचने का साधन बनता था. रूस में भी क्रांति ने सत्ता को बदलने का सवाल उठाया. लेकिन भारत की जमीन पर जब क्रांतिकारी विचार पहुंचे, तो उन्हें एक बिल्कुल अलग समाज, अलग इतिहास और अलग दार्शनिक परंपरा से गुजरना पड़ा.
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वो साल 1967 का था. पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग क्षेत्र एक छोटा - सा इलाका - नक्सलबाड़ी. जमींदारों के शोषण, भूमि असमानता और किसानों को उनकी जमीन का मालिकाना हक दिलाने को लेकर एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ. चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल ने गांवों में काम करने वाले गरीब मजदूरों और किसानों का एक बड़ा कैडर खड़ा कर दिया. नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़े कैडर पर चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के सबसे बड़े नेता के विचारों का बड़ा प्रभाव था. माओ-त्से-तुंग साफ-साफ कहते थे, सत्ता बंदूक की नली से निकलती है. ऐसे में दार्जिलिंग और सिलिगुड़ी के चाय बगानों में काम करने वाले किसानों और श्रमिकों ने भी कंधे पर बंदूक टांगनी शुरू कर दी.
नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ बंदूक के दम पर बदलाव के लिए अंदोलन बाद में भारतीय नक्सलवाद के लिए प्रतीक बन गया. नक्सल आंदोलन की पृष्ठभूमि में केवल विदेशी विचारधारा नहीं थी. भारत के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने से निकले मूल सवाल भी थे. मसलन, भूमि का सवाल, गरीबी, आदिवासी इलाकों में शोषण, सामाजिक असमानता, राज्य की कमजोर मौजूदगी और विकास से दूरी. लेकिन, भारतीय परंपरा में समस्याओं सुलझाने का रास्ता सशस्त्र संघर्ष की जगह संवाद का रहा है.
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द्वापर युग में महाभारत के दौरान कुरुक्षेत्र में सेनाएं दोनों ओर खड़ी हैं. लेकिन, सामने खड़े शत्रु पक्ष पर हथियार उठाने से पहले अर्जुन श्रीकृष्ण से संवाद करते हैं - सवाल करते हैं? वहां से कर्मयोग की नई धारा निकलती है. कठोपनिषद में नचिकेता मृत्यु के देवता यम से पूछता है - मृत्यु के बाद क्या होता है? इस सवाल से दर्शन की एक नई परंपरा विकसित होती है.
बौद्ध परंपरा में अनुभव, तर्क और विवेक को अहमियत मिलती है, तो जैन दर्शन में अनेकांतवाद का विचार यह मानता है कि सत्य को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है.
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भारत की गुरु-शिष्य परंपरा ने इस सोच को आम आदमी तक पहुंचाया कि सच्चा ज्ञान सिर्फ उत्तर सुनने से नहीं, सही सवाल पूछने से पैदा होता है. ऐसे में जब 20वीं शताब्दी में दुनिया की क्रांतिकारी विचारधाराएं भारत पहुंची. खास तौर से रूस और चीन से तो उनका सामना एक ऐसी सभ्यता से हुआ - जिसके पास विचारों से संघर्ष की अपनी बहुत समृद्ध परंपरा थी.
नक्सलवाद जहां व्यवस्था परिवर्तन के लिए हिंसक क्रांति की वकालत करता है. वहीं, इस बाहरी विचारधारा का लोकतंत्र से टकराव शुरू हो जाता है. लोकतंत्र संवैधानिक और राजनीतिक रास्तों से बदलाव की वकालत करता है. संभवत: यही वजह है कि संवाद परंपरा वाले भारत की बड़ी आबादी ने हमेशा अपनी समस्याओं के समाधान के लिए नक्सलियों के बुलेट वाले तौर-तरीके की जगह बैलेट के जरिए बदलाव का रास्ता चुना.
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चीन और रूस जैसी समस्या भारत की भी हो सकती. लेकिन, ये जरूरी नहीं कि समस्या के समाधान का रास्ता चीन और रूस जैसा भारत में भी कारगर हो. अगर किसी आदिवासी को जमीन का अधिकार नहीं मिलता, अगर किसी गरीब को न्याय नहीं मिलता, अगर कोई इलाका दशकों तक विकास से दूर रहता है तो असंतोष पैदा होगा. लेकिन, इसका मतलब ये नहीं चीन और रूस की तरह भारत में भी बंदूक से क्रांति संभव हो, बदलाव संभव हो. क्योंकि, भारत में सामाजिक बदलाव की परंपरा नक्सलवाद या बंदूक से नहीं शुरू होती है. किसी भी समस्या के समाधान के लिए बंदूक को आखिरी विकल्प के तौर पर देखा जाता है.
भारत की सभ्यता में विचारों की बहस की परंपरा हजारों साल पुरानी है. महाभारत में कृष्ण और अर्जुन का संवाद देखिए, युद्ध सामने है, लेकिन शुरुआत संवाद से होती है. बुद्ध को देखिए, जिन्होंने मनुष्य और समाज के सामने हिंसा, दुख और जीवन के अर्थ को लेकर सवाल खड़े किए. महावीर को देखिए, जिन्होंने अहिंसा को जीवन का रास्ता बनाया. भारत की दार्शनिक परंपरा में विचार सिर्फ सत्ता हासिल करने का जरिया नहीं रहा, इंसान और समाज को बदलने का माध्यम भी रहा है.
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प्रधानमंत्री मोदी जब कहते हैं कि हथियारी नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दिमागी नक्सल की परिभाषा क्या है? अगर कोई व्यक्ति सरकार की आलोचना करता है तो क्या वह दिमागी नक्सल हो जाता है. अगर कोई संविधान में बदलाव चाहता है तो क्या वह दिमागी नक्सल हो जाता है. अगर कोई पूंजीवाद की आलोचना करता है तो क्या वह दिमागी नक्सल हो जाता है. अगर कोई किसी सरकारी नीति का विरोध करता है तो क्या वह दिमागी नक्सल हो जाता है. अगर छात्र पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन करते हैं – शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग करते हैं तो क्या वो दिमागी नक्सल हैं. भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जो संविधान से चलता है. संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत हम भारत के लोगों से होती है. हमारी लोकतंत्रीय व्यवस्था में संविधान के दायरे में असहमति अपराध नहीं है. ऐसे में ‘दिमागी नक्सल’ ने हमारी लोकतंत्रीय व्यवस्था के भीतर एक नई बहस को आकार देना शुरू कर दिया है कि आखिर असहमति की सीमा क्या हो?
अब सवाल उठता है कि आखिर दिमागी नक्सल कौन है और इसकी परिभाषा क्या है? कौन समाज को गलत दिशा में ले जाने की कोशिश कर रहा है?
जब लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं है - तो फिर इसकी सीमा क्या है? क्या आप लोकतांत्रिक प्रक्रिया को स्वीकार करते हैं? क्या आप अपने विरोधी विचार के अस्तित्व के अधिकार को स्वीकार करते हैं? क्या आप राजनीतिक हिंसा को वैध मानते हैं?
अगर कोई लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से व्यवस्था परिवर्तन की बात करता है - तो उसकी विचारधारा से असहमति हो सकती है. लेकिन, सिर्फ अलहदा विचार की वजह से किसी को नक्सल कहना लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करेगा. वहीं, कोई अगर लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान से अलग जा कर बंदूक से व्यवस्था परिवर्तन की बात करता है तो यह सिर्फ राजनीतिक असहमति नहीं है. लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने एक अलग और बहुत गंभीर चुनौती है.
प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह दिमागी नक्सल का जिक्र किया- उसका एक मतलब ये भी निकला जा रहा है कि मौजूदा समय में सरकार के सामने चुनौती - उस मानसिकता की भी है - जो हिंसा और अराजकता को कुबूल करती है. लेकिन, जब किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक नागरिक पूछता है कि बेरोजगारी क्यों है? महंगाई क्यों बढ़ी? किसी योजना का लाभ गरीब तक क्यों नहीं पहुंचा? सरकार ने यह फैसला क्यों लिया? पुलिस कार्रवाई सही थी या नहीं? संसद में विपक्ष की भूमिका क्या होनी चाहिए? विश्वविद्यालय में किसी विचार को पढ़ने या उसकी आलोचना करने की स्वतंत्रता कितनी होनी चाहिए?
अगर ऐसे विरोधी सुर, सवाल और आलोचना की मानसिकता पर सवाल खड़े किए जाएं - तो लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह कहां बचेगी? ऐसे बुनियादी सवाल लोकतंत्र को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत करते हैं. सत्ता पक्ष को गलतियां ठीक करने के लिए सचेत करते हैं? मौजूदा बहस के बीच अहम सवाल ये है कि आखिर दिमागी नक्सल वाली मानसिकता की पहचान कैसे होगी, किस कसौटी पर होगी और कौन करेगा?
दक्षिणपंथ भी एक विचार है. दक्षिणपंथ भी समाज को एक खास दिशा में बदलना चाहता है. वह भी संगठन बनाता है, लोगों के बीच जाता है, अपने विचारों का प्रचार करता है, साहित्य तैयार करता है और समाज और राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करता है. अगर समाज और सत्ता की दिशा बदलने की कोशिश को ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाएगा. तो फिर सवाल सिर्फ वामपंथ से नहीं पूछा जा सकता. क्या दक्षिणपंथ भी ‘दिमागी नक्सल’ कहलाएगा? संभवत: जवाब नहीं होगा. अगर जवाब नहीं है, तो फिर मानना पड़ेगा कि केवल व्यवस्था बदलने का विचार किसी व्यक्ति या संगठन को नक्सल नहीं बनाता. शायद असली कसौटी यह नहीं है कि आप क्या बदलना चाहते हैं, बल्कि यह है कि आप उसे बदलना कैसे चाहते हैं? क्या आप चुनाव को स्वीकार करते हैं? क्या आप संविधान और कानून की प्रक्रिया को स्वीकार करते हैं? क्या आप अपने विरोधी विचार को भी अहमियत देते हैं? क्या आप सत्ता परिवर्तन के लिए लोकतंत्र के रास्तों को स्वीकार करते हैं? अगर कोई व्यक्ति व्यवस्था परिवर्तन चाहता है, वो चुनाव, संसद, अदालत, आंदोलन, लेखन और सार्वजनिक बहस के रास्ते को स्वीकार करता है, तो उसकी विचारधारा से असहमति हो सकती है. लेकिन सिर्फ विरोधी विचार की वजह से नक्सल कह देना लोकतंत्र की बहस को कमजोर करता है. लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां किसी विचार को सिर्फ इसलिए खत्म नहीं किया जाता क्योंकि वह असुविधाजनक है. उसका जवाब दूसरे विचार से दिया जाता है.
आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव में मध्यमार्गी कांग्रेस, सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट और दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रभावित पार्टियों ने लोगों से वोट मांगा. सभी अपने-अपने तरीके से भारत निर्माण करना चाहते थे. लेकिन, लोगों ने अपने वोट से मध्यमार्गी कांग्रेस को सत्ता के लिए चुना. ऐसी परंपराओं को विकसित किया गया - जिसमें लोकतंत्र की मजबूती में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर दमदार भूमिका निभा सकें.
दक्षिणपंथ हो, वामपंथ हो, समाजवाद हो, उदारवाद हो, राष्ट्रवाद हो या दूसरी विचारधारा. लोकतंत्र में विचारों के लिए भरपूर जगह है. हिंसा के लिए नहीं.
ये भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है - जिसमें राजनीतिक दलों ने समय के साथ अपनी विचारधारा में संशोधन किया - जिससे लोगों के अधिक करीब पहुंच सकें. आपातकाल के बाद लोगों ने वोट की चोट से कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया. अलग-अलग विचारधारा से जुड़ी पार्टियों ने मिलकर केंद्र में सरकार बनाई. लेकिन, करीब ढाई साल बाद दोबारा कांग्रेस की प्रचंड बहुमत से सत्ता में वापसी हुई.
भारत की परंपरा में प्रश्न करना कमजोरी नहीं ताकत माना गया है. इसी परंपरा को हमारा संसदीय लोकतंत्र आगे बढ़ा रहा है. लेकिन, सोशल मीडिया के दौर में सवाल और बहस का स्वरूप तेजी से बदला है.
एक ट्वीट, एक पोस्ट, एक वीडियो कुछ देर में ही एक खास चेहरा किसी विचारधारा के पोस्टर ब्वॉय के तौर पर देखा जाने लगता है. ट्रोल आर्मी एक्टिव हो जाती है. अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी को हीरो, तो किसी को देशद्रोही, अर्बन नक्सल, दिमागी नक्सल, फासीवादी, कट्टरपंथी
का नाम दिया जाने लगता है. ऐसे में व्यक्ति का विचार हाशिए पर पहुंच जाता है. राजनीतिक शब्दावली से निकली पहचान ड्राइविंग सीट पर आ जाती है. किसी पर लेबल चिपकाने के साथ ही दूसरे विचार का तर्क के साथ जवाब देने की जरूरत कम हो जाती है.
अगर दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों ने आंदोलन नहीं किया होता - तो आज शिक्षा-व्यवस्था में सुधार की बात इतनी मुखर तरीके से नहीं होती. अगर साल 2021 में किसानों ने विरोध-प्रदर्शन नहीं किया होता - तो केंद्र सरकार ने तीनों विवादित कृषि कानूनों को वापस नहीं लिया होता. अगर साल 2012 में दिल्ली में निर्भया रेप केस के बाद विरोध-प्रदर्शन नहीं हुआ होता तो महिलाओं की सुरक्षा को लेकर इतने नीतिगत बदलाव नहीं हुए होते. मतलब, किसी भी जीवंत समाज की तरक्की के लिए सवाल जरूरी है.
दिमागी नक्सल पर बहस के बीच तीन तरह के हालात सामने आ सकते हैं. पहला, सवाल पूछने वाले हर व्यक्ति को राष्ट्र-विरोधी या नक्सल कहना लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकता है. दूसरा, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल और आलोचना बहस का मुद्दा है. तीसरा, बंदूक के जरिए बदलाव और हिंसक राजनीतिक कार्रवाई की बात करना राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय है. ऐसे में तीनों हालत को एक चश्मे से देखना विचार और सवाल की परंपरा को कमजोर करने जैसा होगा.
भारत की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यहां सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के रास्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहे. कभी आंदोलन से बदलाव आया, कभी चुनाव से, कभी संसद से, कभी अदालत से और कभी सड़क पर उठी आवाज ने सत्ता को अपनी नीति बदलने के लिए मजबूर किया. भारत में सत्ता बदली है, सरकारें बदली हैं, कानून बदले हैं और समाज भी बदला है. लेकिन हर बदलाव के लिए बंदूक की जरूरत नहीं पड़ी. यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है कि वह असंतोष को अपने भीतर जगह देने की कोशिश करता है. वह हर असहमति को क्रांति बनने से पहले चुनाव, आंदोलन, बहस और संवैधानिक प्रक्रिया में बदलने का अवसर देता है. यहीं ‘दिमागी नक्सल’ शब्द की सबसे बड़ी परीक्षा होती है. अगर इसका मतलब उस मानसिकता से है जो हिंसक नक्सलवाद को वैचारिक रूप से सही ठहराती है, तो उस पर गंभीर बहस हो सकती है. लेकिन अगर यह शब्द हर उस व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होने लगे जो सरकार की आलोचना करता है, व्यवस्था बदलने की बात करता है या सरकार से असहमत है, तो यह शब्द अपनी सीमाएं खो देता है. फिर यह एक विश्लेषणात्मक शब्द नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक लेबल बन जाता है. राजनीति में लेबल बहुत सुविधाजनक होते हैं, क्योंकि लेबल लगाते ही बहस आसान हो जाती है और आपको सामने वाले के तर्क का जवाब नहीं देना पड़ता, सिर्फ उसकी पहचान पर सवाल उठाना पड़ता है.
लोकतंत्र में हक-हुकूक की बात करना अपराध नहीं, शिक्षा व्यवस्था में बदलाव या रोजगार की मांग करना अपराध नहीं, विचार अपराध नहीं, असहमति अपराध नहीं, सरकार की आलोचना अपराध नहीं, सरकार बदलने की इच्छा अपराध नहीं, क्रांति की सोच भी अपराध नहीं. लेकिन, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बंदूक के सामने खड़ा करना, संवैधानिक व्यवस्था को हिंसक तरीके से खत्म करने की कोशिश करना अपराध है.
भारतीय लोकतंत्र में विचार का जवाब विचार से देने की परंपरा रही है. नए विचारों को तर्क की कसौटी पर कसने की परंपरा रही है. विचार का जवाब बंदूक या हिंसा से देने की नहीं.
भारत विचारों के मामले में बहुत समृद्ध रहा है. हर कालखंड में समस्याओं को सुलझाने का रास्ता संवाद और विचार के जरिए निकालने की कोशिश होती रही है. कृष्ण के पास संवाद था तो बुद्ध के पास प्रश्न, महावीर के पास अहिंसा थी. तो चार्वाक के पास स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने का साहस था और आधुनिक भारत के पास - संविधान है.
संविधान हमें अधिकार देता है, लेकिन जिम्मेदारी भी देता है. विचार रखने का अधिकार, लेकिन हिंसा करने का नहीं, असहमति का अधिकार, किन दूसरे के अस्तित्व को खत्म करने का नहीं. सरकार की आलोचना का अधिकार, लेकिन लोकतंत्र को हिंसा से खत्म करने का अधिकार नहीं. क्योंकि, बंदूक से कुछ समय के लिए व्यवस्था बदली जा रही है. सत्ता परिवर्तन किया जा सकता है. लेकिन, समाज को लंबे समय तक बदलने की ताकत समावेशी और व्यवहारिक विचारों में होती है.
ऐसे में लोकतंत्र की ताकत इसमें नहीं कि विरोधी विचार को शांत करा दिया जाये या सन्नाटे में पहुंचा दिया जाए. असली ताकत इसमें है कि विचारों के बीच तर्क-वितर्क के लिए माहौल किस तरह बनाए रखा जाए? विरोधी विचार को भी तर्क की कसौटी पर कसते हुए व्यवस्था और नीतिगत बदलाव के लिए पहल कैसे की जाए?
किसी भी लोकतंत्र में सरकार स्थायी नहीं होती, विचार स्थायी नहीं होते और व्यवस्था भी स्थायी नहीं होती. बदलाव लोकतंत्र का हिस्सा है. असली सवाल बदलाव का नहीं, बदलाव के रास्ते का है. अगर कोई विचार कहता है कि समाज बदलेगा, वह बदलाव वोट, बहस, आंदोलन, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं के रास्ते से होगा, तो उससे असहमति हो सकती है. लेकिन, उसे दिमागी नक्सल नहीं कहा जा सकता. लेकिन, अगर वही विचार लोकतांत्रिक रास्ते को खारिज कर हिंसा को सत्ता परिवर्तन का साधन मानता है, तो वह एक अलग सवाल है और उस पर बहस होनी चाहिए. भारत में विचारों की परंपरा बहुत पुरानी है. यहां कृष्ण का संवाद है, बुद्ध की करुणा है, महावीर की अहिंसा है, महात्मा गांधी का सत्य और अहिंसा है और आधुनिक भारत का संविधान भी है, जो असहमति को जगह देता है. इसलिए सवाल यह नहीं कि समाज में कितने विचार हैं. सवाल यह है कि क्या वे विचार एक-दूसरे के साथ लोकतांत्रिक तरीके से रह सकते हैं. क्योंकि बंदूक सत्ता को बदल सकती है, लेकिन समाज को लंबे समय तक बदलने की ताकत विचार में ही होती है. इसलिए हमें यह तय करना होगा कि विचार से लड़ने के लिए विचार चाहिए या सिर्फ एक लेबल. अगर लोकतंत्र में हर असहमति को ‘दिमागी नक्सल’ कह दिया जाएगा तो फिर खतरा सिर्फ नक्सलवाद से नहीं होगा, खतरा उस लोकतांत्रिक बहस से भी होगा, जिसकी वजह से विचारों को जन्म लेने, टकराने और बदलने की आजादी मिलती है. शायद आज का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम विचार से असहमत होना चाहते हैं, या विचार को ही खत्म कर देना चाहते हैं?