प्रधानमंत्री मोदी इंडोनेशिया के दौरे पर हैं और वे जावा द्वीप पर बने ऐतिहासिक शिव मंदिर में दर्शन भी करेंगे। जी हां, करीब 87 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में 1170 साल पुराना दुनियाभर में मशहूर और यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल प्रम्बानन मंदिर है, जिसका भारत से भी कनेक्शन है। इंडोनेशिया के साथ मिलकर भारत इस मंदिर का के जीर्णोद्धार का काम करेगा। आइए जानते हैं कि इस मंदिर की कहानी, इतिहास, महत्व और भारत के साथ कनेक्शन क्या है?
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इंडोनेशिया में 20000 से ज्यादा मंदिर
बता दें कि इंडोनेशिया में छोटे-बड़े मिलाकर 20000 से ज्यादा हिंदू मंदिर हैं, जिन्हें वहां पुरा या चांडी कहा जाता है। वहीं सबसे ज्यादा मंदिर बाली द्वीप पर हैं और बाली की आबादी भी हिंदू बहुसंख्यक है। बाली के अलावा जावा, लोम्बोक और अन्य द्वीपों पर भी मंदिर हैं। मध्य जावा द्वीप पर प्रम्बानन मंदिर, चांडी सुकुह, चांडी चेतो हैं। वहीं बाली के प्रमुख मंदिर बेसाकीह मंदिर, तनाह लोट मंदिर, उलुवातु मंदिर, तिर्ता एम्पुल मंदिर, गोवा लवाह मंदिर, तमन आयुन मंदिर, पुरा उलुन दानु ब्रातन मंदिर हैं।
यूनेस्को की विश्व धरोहर है प्रम्बानन मंदिर
बता दें कि साल 1991 में यूनेस्को ने इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। आज यह इंडोनेशिया का सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जिसे देखने हर साल लाखों लोग आते हैं। प्रम्बानन मंदिर इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर योग्यकार्ता शहर के पास बना है। देश की राजधानी जकार्ता से यह 500 किलोमीटर है। यह मंदिर 9वीं शताब्दी का है और इसकी गिनती दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे भव्य हिंदू मंदिरों में होती है। अब भारत-इंडोनेशिया मिलकर इसे संरक्षित करेंगे।
संजय वंश के राजा ने बनवाया था मंदिर
19वीं-20वीं सदी में खुदाई के दौरान मिले शिलालेखों के अनुसार, यह मंदिर 9वीं सदी में संजय वंश के राजा रकाई पिकातन ने बनवाया था, जिसे अन्य राजाओं ने अपने-अपने तरीके से बदला और विस्तृत किया। एक शिलालेख पर अंकित तारीख से पता चला कि यह मंदिर 1100 साल पुराना है और भगवान शिव को समर्पित है। राजा राकाई पिकातन ने साल 850 में मंदिर का निर्माण कार्य शुरू कराया था। मुख्य शिव मंदिर का उद्घाटन राजा लोकपाल ने साल 856 में किया था। आगे चलकर इस मंदिर के आंगन में भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के मंदिर भी बनवाए गए थे।
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मंदिर को कब-क्यों-कैसे पहुंचा नुकसान?
बता दें कि समय के साथ-साथ मंदिर का महत्व कम होता गया। भूकंप और ज्वालामुखी गतिविधियों ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया। काफी लंबे समय तक मंदिर खंडहर बना रहा। 19वीं शताब्दी में यूरोप के खोजकर्ताओं ने मंदिर पर ध्यान दिया और इसके संरक्षण के साथ पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ। प्रम्बानन मंदिर ऊंची-ऊंची आकर्षक शिखर शैली के लिए मशहूर है। इसमें 240 संरचनाएं, 3 बड़े मंदिर, कुछ छोटे मंदिर, भगवान शिव का मंदिर,भगवान विष्णु का मंदिर और भगवान ब्रह्मा का मंदिर है।
नंदी, गरुड़ और हंस को समर्पित मंदिर भी बने हैं। भगवान शिव का मंदिर सबसे ऊंचा है और इसकी ऊंचाई 47 मीटर है। मंदिर की दीवारों पर बेहद सुंदर नक्काशी है, जिन पर हिंदू धर्म की कथाएं उकेरी गई हैं। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता पत्थरों की नक्काशी है। दीवारों पर रामायण की कथा उकेरी गई है। भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण से जुड़े चित्र पत्थरों पर उकेरे गए हैं।
प्रधानमंत्री मोदी इंडोनेशिया के दौरे पर हैं और वे जावा द्वीप पर बने ऐतिहासिक शिव मंदिर में दर्शन भी करेंगे। जी हां, करीब 87 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में 1170 साल पुराना दुनियाभर में मशहूर और यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल प्रम्बानन मंदिर है, जिसका भारत से भी कनेक्शन है। इंडोनेशिया के साथ मिलकर भारत इस मंदिर का के जीर्णोद्धार का काम करेगा। आइए जानते हैं कि इस मंदिर की कहानी, इतिहास, महत्व और भारत के साथ कनेक्शन क्या है?
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इंडोनेशिया में 20000 से ज्यादा मंदिर
बता दें कि इंडोनेशिया में छोटे-बड़े मिलाकर 20000 से ज्यादा हिंदू मंदिर हैं, जिन्हें वहां पुरा या चांडी कहा जाता है। वहीं सबसे ज्यादा मंदिर बाली द्वीप पर हैं और बाली की आबादी भी हिंदू बहुसंख्यक है। बाली के अलावा जावा, लोम्बोक और अन्य द्वीपों पर भी मंदिर हैं। मध्य जावा द्वीप पर प्रम्बानन मंदिर, चांडी सुकुह, चांडी चेतो हैं। वहीं बाली के प्रमुख मंदिर बेसाकीह मंदिर, तनाह लोट मंदिर, उलुवातु मंदिर, तिर्ता एम्पुल मंदिर, गोवा लवाह मंदिर, तमन आयुन मंदिर, पुरा उलुन दानु ब्रातन मंदिर हैं।
यूनेस्को की विश्व धरोहर है प्रम्बानन मंदिर
बता दें कि साल 1991 में यूनेस्को ने इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। आज यह इंडोनेशिया का सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जिसे देखने हर साल लाखों लोग आते हैं। प्रम्बानन मंदिर इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर योग्यकार्ता शहर के पास बना है। देश की राजधानी जकार्ता से यह 500 किलोमीटर है। यह मंदिर 9वीं शताब्दी का है और इसकी गिनती दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे भव्य हिंदू मंदिरों में होती है। अब भारत-इंडोनेशिया मिलकर इसे संरक्षित करेंगे।
संजय वंश के राजा ने बनवाया था मंदिर
19वीं-20वीं सदी में खुदाई के दौरान मिले शिलालेखों के अनुसार, यह मंदिर 9वीं सदी में संजय वंश के राजा रकाई पिकातन ने बनवाया था, जिसे अन्य राजाओं ने अपने-अपने तरीके से बदला और विस्तृत किया। एक शिलालेख पर अंकित तारीख से पता चला कि यह मंदिर 1100 साल पुराना है और भगवान शिव को समर्पित है। राजा राकाई पिकातन ने साल 850 में मंदिर का निर्माण कार्य शुरू कराया था। मुख्य शिव मंदिर का उद्घाटन राजा लोकपाल ने साल 856 में किया था। आगे चलकर इस मंदिर के आंगन में भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के मंदिर भी बनवाए गए थे।
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नंदी, गरुड़ और हंस को समर्पित मंदिर भी बने हैं। भगवान शिव का मंदिर सबसे ऊंचा है और इसकी ऊंचाई 47 मीटर है। मंदिर की दीवारों पर बेहद सुंदर नक्काशी है, जिन पर हिंदू धर्म की कथाएं उकेरी गई हैं। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता पत्थरों की नक्काशी है। दीवारों पर रामायण की कथा उकेरी गई है। भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण से जुड़े चित्र पत्थरों पर उकेरे गए हैं।