Oil Prices: ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले से कच्चे तेल (क्रूड) में 3-4% की गिरावट देखी गई, क्योंकि तत्काल अमेरिकी हमले का डर कम हुआ, लेकिन बाजार अभी भी खतरे से पूरी तरह बाहर नहीं निकला है. ऑस्ट्रेलिया-ट्रेडिंग.कॉम के सीईओ पीटर मैकगवायर ने चेतावनी देते हुए कहा कि भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी बहुत ऊंचे हैं. मध्य पूर्व में तनाव नियंत्रण में रहने पर भारत जैसे आयात करने वाले देशों के लिए कीमतें 50 डॉलर के आसपास रह सकती हैं.
खाड़ी में सप्लाई बाधित हुईं तो कीमतें बढ़ेंगी
इकॉनामिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार ईरान की रणनीतिक स्थिति और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले ग्लोबल तेल शिपमेंट के बड़े हिस्से को देखते हुए कोई भी तनाव सप्लाई को बाधित कर सकता है. मैकगवायर के अनुसार, दुनिया का लगभग एक तिहाई कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है. अगर फारस की खाड़ी में सप्लाई किसी भी तरह प्रभावित हुई तो कीमतों में भारी उछाल आ सकता है. इतिहास इसका गवाह रहा है. बाजार फिलहाल 'इंतजार करो और देखो' मोड में है.
यह भी पढ़ें: ईरान ने 800 लोगों की फांसी टाली तो हमले से पीछे हटा अमेरिका, पर विकल्प खुले
भारत के लिए क्यों बड़ा खतरा?
भारत अपनी तेल जरूरत का 85% से ज्यादा आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है. इंपोर्ट बिल बढ़ने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें, माल ढुलाई लागत और कुल मिलाकर महंगाई पर असर पड़ता है. मैकगवायर का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव काबू में रहा और कोई बड़ा भू-राजनीतिक झटका नहीं आया, तो 2026 की पहली छमाही में कच्चे तेल की कीमतें 50 डॉलर के निचले से मध्य स्तर पर कारोबार कर सकती हैं. यह भारत जैसे आयातक देशों और उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात होगी, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि एनर्जी मार्केट के लिए भू-राजनीति अभी भी सबसे बड़ा अनिश्चित कारक बना हुआ है.
ईरान का रोल और सप्लाई रिस्क
ईरान ओपेक का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है और ग्लोबल तेल उत्पादन का करीब 4% हिस्सा रखता है. अगर संघर्ष बढ़ा, तो 'वॉर प्रीमियम' दोबारा सक्रिय हो सकता है, जिससे कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं. मैकगवायर का मानना है कि लंबे समय में बिजली की बढ़ती मांग और पेट्रोकेमिकल्स से प्रेरित होकर ग्लोबल तेल खपत साल-दर-साल बढ़ रही है, लेकिन निकट अवधि में कीमतें बुनियादी फैक्टर्स से ज्यादा भू-राजनीति से तय होंगी.
यह भी पढ़ें: ईरान में अब कैसे हैं हालात? कौन हैं Saedinia, जिनकी गिरफ्तारी के बाद थम गए दंगे और विरोध प्रदर्शन
Oil Prices: ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले से कच्चे तेल (क्रूड) में 3-4% की गिरावट देखी गई, क्योंकि तत्काल अमेरिकी हमले का डर कम हुआ, लेकिन बाजार अभी भी खतरे से पूरी तरह बाहर नहीं निकला है. ऑस्ट्रेलिया-ट्रेडिंग.कॉम के सीईओ पीटर मैकगवायर ने चेतावनी देते हुए कहा कि भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी बहुत ऊंचे हैं. मध्य पूर्व में तनाव नियंत्रण में रहने पर भारत जैसे आयात करने वाले देशों के लिए कीमतें 50 डॉलर के आसपास रह सकती हैं.
खाड़ी में सप्लाई बाधित हुईं तो कीमतें बढ़ेंगी
इकॉनामिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार ईरान की रणनीतिक स्थिति और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले ग्लोबल तेल शिपमेंट के बड़े हिस्से को देखते हुए कोई भी तनाव सप्लाई को बाधित कर सकता है. मैकगवायर के अनुसार, दुनिया का लगभग एक तिहाई कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है. अगर फारस की खाड़ी में सप्लाई किसी भी तरह प्रभावित हुई तो कीमतों में भारी उछाल आ सकता है. इतिहास इसका गवाह रहा है. बाजार फिलहाल ‘इंतजार करो और देखो’ मोड में है.
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भारत के लिए क्यों बड़ा खतरा?
भारत अपनी तेल जरूरत का 85% से ज्यादा आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है. इंपोर्ट बिल बढ़ने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें, माल ढुलाई लागत और कुल मिलाकर महंगाई पर असर पड़ता है. मैकगवायर का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव काबू में रहा और कोई बड़ा भू-राजनीतिक झटका नहीं आया, तो 2026 की पहली छमाही में कच्चे तेल की कीमतें 50 डॉलर के निचले से मध्य स्तर पर कारोबार कर सकती हैं. यह भारत जैसे आयातक देशों और उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात होगी, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि एनर्जी मार्केट के लिए भू-राजनीति अभी भी सबसे बड़ा अनिश्चित कारक बना हुआ है.
ईरान का रोल और सप्लाई रिस्क
ईरान ओपेक का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है और ग्लोबल तेल उत्पादन का करीब 4% हिस्सा रखता है. अगर संघर्ष बढ़ा, तो ‘वॉर प्रीमियम’ दोबारा सक्रिय हो सकता है, जिससे कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं. मैकगवायर का मानना है कि लंबे समय में बिजली की बढ़ती मांग और पेट्रोकेमिकल्स से प्रेरित होकर ग्लोबल तेल खपत साल-दर-साल बढ़ रही है, लेकिन निकट अवधि में कीमतें बुनियादी फैक्टर्स से ज्यादा भू-राजनीति से तय होंगी.
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