China government offer public to born maximum child: चीन अब लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए नकद इनाम देने की तैयारी कर रहा है। जनसंख्या में तेज़ गिरावट और बुजुर्ग आबादी में बढ़ोतरी की चिंता के बीच चीन सरकार एक नई नीति लेकर आई है, जिसके तहत बच्चों के जन्म पर सरकारी सब्सिडी दी जाएगी। गौरतलब है कि चीन की जनसंख्या 2022 से लगातार घट रही है। कभी दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश अब जनसांख्यिकीय संकट की ओर बढ़ रहा है।
2016 में ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ खत्म होने के बाद भी अपेक्षित सुधार देखने को नहीं मिला। 2023 में केवल 95.4 लाख बच्चों का जन्म हुआ, जो 2016 के आंकड़ों से लगभग आधा है। इसी गिरावट को रोकने के लिए सरकार अब माता-पिता को नकद प्रोत्साहन देगी ताकि वे अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित हों।
हर साल कपल को 42000 रुपये मिलेंगे
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, 1 जनवरी 2025 के बाद जन्म लेने के बाद चीन सरकार हर साल 42 हजार रुपये देगी। यह रकम सीधे माता या पिता के खाते में जमा की जाएगी और इसे बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य या देखभाल पर खर्च किया जा सकता है। यह स्कीम उन दंपत्तियों के लिए बड़ी राहत बन सकती है जो आर्थिक कारणों से दूसरे या तीसरे बच्चे के बारे में सोच भी नहीं पाते।
दुनिया के कई देशों में ऐसी नीतियां
केंद्र के साथ-साथ चीन की स्थानीय सरकारें भी इस दिशा में सक्रिय हो गई हैं। उदाहरण के लिए, इनर मंगोलिया के होहोट शहर में दूसरे बच्चे के जन्म पर 50,000 युआन (5.8 लाख रुपये) और तीसरे बच्चे पर 100,000 युआन (11.6 लाख रुपये) तक की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। ये रकम वहां के औसत वेतन के हिसाब से काफी मायने रखती है। दुनिया के कई देशों में ऐसी नीतियों के मिश्रित परिणाम सामने आए हैं। दक्षिण कोरिया ने 2024 में अपने चाइल्डबर्थ इंसेंटिव्स बढ़ाए।
जापान में खोले हजारों चाइल्ड केअर सेंटर
वहीं जापान ने नकद सहायता की बजाय 2005 से हजारों चाइल्ड केअर सेंटर खोलकर माता-पिता को सुविधा दी। इससे वहां की प्रजनन दर में 0.1 की मामूली बढ़ोतरी देखी गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल नकद सहायता से जनसंख्या में बढ़ोतरी लाना मुश्किल हो सकता है। जरूरी है कि नौकरी की सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी सुविधाएं भी दी जाएं, ताकि लोग आत्मविश्वास के साथ परिवार बढ़ाने का निर्णय ले सकें।
भारत को भी ऐसी नीतियों पर करना पड़ेगा विचार
भारत की जनसंख्या अभी भी स्थिर नहीं हुई है, लेकिन शहरी इलाकों में कम जन्मदर और बढ़ती आर्थिक चिंताओं को देखकर यह स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में भारत को भी ऐसी नीतियों पर विचार करना पड़ सकता है। खासकर मिडल क्लास और वर्किंग पेरेंट्स को आर्थिक और सामाजिक सहारा दिए बिना परिवार बढ़ाना मुश्किल होता जा रहा है। चीन की यह नई नीति दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। यह एक साहसिक कदम है, लेकिन इसके साथ-साथ अगर सरकार स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और कार्य-जीवन संतुलन जैसे क्षेत्रों में भी निवेश करे तभी यह नीति वाकई कारगर हो पाएगी।