पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी को कलकत्ता हाई कोर्ट से एक और बहुत बड़ा झटका लगा है. अदालत ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) के पद पर बागी विधायक ऋतब्रत भट्टाचार्य की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर कोई भी अंतरिम राहत देने से साफ मना कर दिया है. जस्टिस कृष्ण राव की एकल पीठ ने साफ किया कि विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) का फैसला अगली सुनवाई तक पूरी तरह लागू रहेगा.
क्या है पूरा विवाद?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक बड़ा सियासी संकट खड़ा हो गया था. पार्टी से निकाले जा चुके बागी नेता ऋतब्रत भट्टाचार्य ने टीएमसी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. ऋतब्रत ने दावा किया था कि उन्हें पार्टी के 58 बागी विधायकों का समर्थन हासिल है. इस बागी गुट ने ममता बनर्जी को तो अपना नेता माना, लेकिन उनके भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को मानने से पूरी तरह इनकार कर दिया. इस सियासी घमासान के बीच, पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथींद्र बोस ने बागी गुट के दावे को स्वीकार करते हुए ऋतब्रत भट्टाचार्य को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी थी. स्पीकर के इस फैसले ने ममता बनर्जी के आधिकारिक उम्मीदवार सोवंदेब चटर्जी के दावे को दरकिनार कर दिया था, जिन्हें खुद ममता बनर्जी का समर्थन हासिल था.
कोर्ट ने स्पीकर के फैसले को रखा बरकरार
स्पीकर के इस कदम के खिलाफ ममता बनर्जी के खेमे ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया था. याचिका में दलील दी गई थी कि स्पीकर का यह फैसला आधिकारिक राजनीतिक दल की अनदेखी करता है और संवैधानिक नियमों के खिलाफ है. हालांकि, हाई कोर्ट ने इस पर अंतरिम रोक लगाने की मांग को खारिज कर दिया.
अदालत ने अब सभी पक्षों को अगली सुनवाई से पहले अपने जवाब (हलफनामे) दाखिल करने का निर्देश दिया है. विरोधी पक्षों को अपना जवाब देने के लिए तीन हफ्ते का समय मिला है, जबकि याचिकाकर्ता को उसके बाद दो हफ्ते में अपना पक्ष रखना होगा. इस बड़े कानूनी मामले की अगली सुनवाई अब 28 जुलाई को होगी, तब तक ऋतब्रत भट्टाचार्य ही बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बने रहेंगे.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी को कलकत्ता हाई कोर्ट से एक और बहुत बड़ा झटका लगा है. अदालत ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) के पद पर बागी विधायक ऋतब्रत भट्टाचार्य की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर कोई भी अंतरिम राहत देने से साफ मना कर दिया है. जस्टिस कृष्ण राव की एकल पीठ ने साफ किया कि विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) का फैसला अगली सुनवाई तक पूरी तरह लागू रहेगा.
क्या है पूरा विवाद?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक बड़ा सियासी संकट खड़ा हो गया था. पार्टी से निकाले जा चुके बागी नेता ऋतब्रत भट्टाचार्य ने टीएमसी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. ऋतब्रत ने दावा किया था कि उन्हें पार्टी के 58 बागी विधायकों का समर्थन हासिल है. इस बागी गुट ने ममता बनर्जी को तो अपना नेता माना, लेकिन उनके भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को मानने से पूरी तरह इनकार कर दिया. इस सियासी घमासान के बीच, पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथींद्र बोस ने बागी गुट के दावे को स्वीकार करते हुए ऋतब्रत भट्टाचार्य को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी थी. स्पीकर के इस फैसले ने ममता बनर्जी के आधिकारिक उम्मीदवार सोवंदेब चटर्जी के दावे को दरकिनार कर दिया था, जिन्हें खुद ममता बनर्जी का समर्थन हासिल था.
कोर्ट ने स्पीकर के फैसले को रखा बरकरार
स्पीकर के इस कदम के खिलाफ ममता बनर्जी के खेमे ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया था. याचिका में दलील दी गई थी कि स्पीकर का यह फैसला आधिकारिक राजनीतिक दल की अनदेखी करता है और संवैधानिक नियमों के खिलाफ है. हालांकि, हाई कोर्ट ने इस पर अंतरिम रोक लगाने की मांग को खारिज कर दिया.
अदालत ने अब सभी पक्षों को अगली सुनवाई से पहले अपने जवाब (हलफनामे) दाखिल करने का निर्देश दिया है. विरोधी पक्षों को अपना जवाब देने के लिए तीन हफ्ते का समय मिला है, जबकि याचिकाकर्ता को उसके बाद दो हफ्ते में अपना पक्ष रखना होगा. इस बड़े कानूनी मामले की अगली सुनवाई अब 28 जुलाई को होगी, तब तक ऋतब्रत भट्टाचार्य ही बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बने रहेंगे.