पंजाब और राजस्थान के बीच सतलुज नदी के पानी को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी एक बार फिर गरमाई हुई है. मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान द्वारा राजस्थान से कथित तौर पर भारी बकाया राशि की मांग किए जाने के बाद राजस्थान सरकार ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है.
राजस्थान के जल संसाधन मंत्री सुरेश रावत ने स्पष्ट किया कि सतलुज नदी के पानी पर किसी भी तरह की रॉयल्टी देने का सवाल ही नहीं उठता. उन्होंने इसे पूरी तरह “राजनीति से प्रेरित” बताते हुए कहा कि इतने वर्षों बाद अचानक इतनी बड़ी रकम की मांग करना समझ से परे है, खासकर जब पंजाब में चुनाव नज़दीक हैं.
मंत्री सुरेश रावत ने इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि सतलुज नदी को लेकर शुरुआती समझौते 1920 के दशक में बीकानेर रियासत और पंजाब के बीच ब्रिटिश शासन के तहत किए गए थे. आज़ादी के बाद 1947 के बाद केंद्र सरकार की मौजूदगी में दोनों राज्यों के बीच कई दौर की वार्ताएं और समझौते हुए, लेकिन इनमें कहीं भी पानी पर रॉयल्टी का जिक्र नहीं मिलता.
उन्होंने कहा कि यदि किसी परियोजना की लागत साझा करनी हो तो वह समझ में आता है, लेकिन पानी जैसे प्राकृतिक संसाधन पर रॉयल्टी मांगना तर्कसंगत नहीं है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी राज्य का यह अधिकार नहीं है कि वह पानी देना या रोकना अपने एकतरफा निर्णय से तय करे. इसके लिए केंद्र सरकार के अधीन बोर्ड व्यवस्था है, जो तय करता है कि किस राज्य को कितना पानी मिलेगा और कैसे मिलेगा.
राजस्थान सरकार ने यह भी कहा कि पंजाब की ओर से अब तक कोई औपचारिक या लिखित मांग नहीं आई है. मंत्री ने बताया कि जैसे ही कोई आधिकारिक प्रस्ताव प्राप्त होगा, सरकार कानूनी राय लेकर आगे की कार्रवाई करेगी.
विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल यह विवाद केवल सियासी बयानबाज़ी तक सीमित है, लेकिन आने वाले समय में यह मुद्दा और गंभीर रूप ले सकता है.
पंजाब और राजस्थान के बीच सतलुज नदी के पानी को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी एक बार फिर गरमाई हुई है. मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान द्वारा राजस्थान से कथित तौर पर भारी बकाया राशि की मांग किए जाने के बाद राजस्थान सरकार ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है.
राजस्थान के जल संसाधन मंत्री सुरेश रावत ने स्पष्ट किया कि सतलुज नदी के पानी पर किसी भी तरह की रॉयल्टी देने का सवाल ही नहीं उठता. उन्होंने इसे पूरी तरह “राजनीति से प्रेरित” बताते हुए कहा कि इतने वर्षों बाद अचानक इतनी बड़ी रकम की मांग करना समझ से परे है, खासकर जब पंजाब में चुनाव नज़दीक हैं.
मंत्री सुरेश रावत ने इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि सतलुज नदी को लेकर शुरुआती समझौते 1920 के दशक में बीकानेर रियासत और पंजाब के बीच ब्रिटिश शासन के तहत किए गए थे. आज़ादी के बाद 1947 के बाद केंद्र सरकार की मौजूदगी में दोनों राज्यों के बीच कई दौर की वार्ताएं और समझौते हुए, लेकिन इनमें कहीं भी पानी पर रॉयल्टी का जिक्र नहीं मिलता.
उन्होंने कहा कि यदि किसी परियोजना की लागत साझा करनी हो तो वह समझ में आता है, लेकिन पानी जैसे प्राकृतिक संसाधन पर रॉयल्टी मांगना तर्कसंगत नहीं है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी राज्य का यह अधिकार नहीं है कि वह पानी देना या रोकना अपने एकतरफा निर्णय से तय करे. इसके लिए केंद्र सरकार के अधीन बोर्ड व्यवस्था है, जो तय करता है कि किस राज्य को कितना पानी मिलेगा और कैसे मिलेगा.
राजस्थान सरकार ने यह भी कहा कि पंजाब की ओर से अब तक कोई औपचारिक या लिखित मांग नहीं आई है. मंत्री ने बताया कि जैसे ही कोई आधिकारिक प्रस्ताव प्राप्त होगा, सरकार कानूनी राय लेकर आगे की कार्रवाई करेगी.
विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल यह विवाद केवल सियासी बयानबाज़ी तक सीमित है, लेकिन आने वाले समय में यह मुद्दा और गंभीर रूप ले सकता है.