Maharashtra sex ratio: आर्थिक और औद्योगिक रूप से देश के सबसे विकसित राज्यों में शामिल महाराष्ट्र से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है. शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावों के बावजूद राज्य में जन्म के समय लिंगानुपात में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. हाल ही में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की सांख्यिकीय रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में अब प्रति 1,000 लड़कों के जन्म पर केवल 899 लड़कियों का ही जन्म हो रहा है. यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत (918) से काफी पीछे है.
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बढ़ा फासला
इस रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच का बढ़ता अंतर है. आमतौर पर माना जाता है कि शहरों में बेहतर शिक्षा और जागरूकता के कारण सामाजिक बदलाव तेजी से होता है, लेकिन महाराष्ट्र में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है. आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में ग्रामीण महाराष्ट्र में जन्म के समय लिंगानुपात 888 से बढ़कर 910 हो गया है, जो एक सकारात्मक संकेत है. वहीं दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 908 से भारी गिरावट के साथ सीधे 885 पर पहुंच गया है. शहरों में बेटियों के जन्म दर में आई यह कमी बेहद डरावनी है.
बड़े राज्यों की तुलना में कहां खड़ा है महाराष्ट्र?
अगर देश के अन्य राज्यों से तुलना करें, तो महाराष्ट्र का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक है. महाराष्ट्र का यह आंकड़ा केवल बिहार (896), हरियाणा (885), दिल्ली (876) और उत्तराखंड (872) से ही थोड़ा बेहतर है. बाकी देश के अधिकांश बड़े राज्यों में बेटियों के जन्म का अनुपात महाराष्ट्र से कहीं ज्यादा मजबूत है.
आखिर क्यों आ रही है गिरावट?
विशेषज्ञों के अनुसार, महाराष्ट्र में कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.4 पर आ चुकी है, जो राष्ट्रीय औसत (1.9) से बहुत कम है. राज्य में महिलाओं की औसत विवाह आयु 23.4 वर्ष है और बाल विवाह की दर महज 1 प्रतिशत है. इन सभी पैमानों पर बेहतर होने के बाद भी लिंगानुपात का गिरना एक गंभीर पहेली है.
एक मुख्य वजह यह सामने आ रही है कि महाराष्ट्र में सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों पर निर्भरता बहुत ज्यादा है. राज्य में 40.9 प्रतिशत प्रसव निजी अस्पतालों में होते हैं, जो देश के बड़े राज्यों में केरल के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है. जानकारों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे की सामाजिक और तकनीकी वजहों की गहरी जांच होनी चाहिए ताकि समय रहते इस खाई को पाटा जा सके.
Maharashtra sex ratio: आर्थिक और औद्योगिक रूप से देश के सबसे विकसित राज्यों में शामिल महाराष्ट्र से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है. शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावों के बावजूद राज्य में जन्म के समय लिंगानुपात में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. हाल ही में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की सांख्यिकीय रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में अब प्रति 1,000 लड़कों के जन्म पर केवल 899 लड़कियों का ही जन्म हो रहा है. यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत (918) से काफी पीछे है.
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बढ़ा फासला
इस रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच का बढ़ता अंतर है. आमतौर पर माना जाता है कि शहरों में बेहतर शिक्षा और जागरूकता के कारण सामाजिक बदलाव तेजी से होता है, लेकिन महाराष्ट्र में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है. आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में ग्रामीण महाराष्ट्र में जन्म के समय लिंगानुपात 888 से बढ़कर 910 हो गया है, जो एक सकारात्मक संकेत है. वहीं दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 908 से भारी गिरावट के साथ सीधे 885 पर पहुंच गया है. शहरों में बेटियों के जन्म दर में आई यह कमी बेहद डरावनी है.
बड़े राज्यों की तुलना में कहां खड़ा है महाराष्ट्र?
अगर देश के अन्य राज्यों से तुलना करें, तो महाराष्ट्र का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक है. महाराष्ट्र का यह आंकड़ा केवल बिहार (896), हरियाणा (885), दिल्ली (876) और उत्तराखंड (872) से ही थोड़ा बेहतर है. बाकी देश के अधिकांश बड़े राज्यों में बेटियों के जन्म का अनुपात महाराष्ट्र से कहीं ज्यादा मजबूत है.
आखिर क्यों आ रही है गिरावट?
विशेषज्ञों के अनुसार, महाराष्ट्र में कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.4 पर आ चुकी है, जो राष्ट्रीय औसत (1.9) से बहुत कम है. राज्य में महिलाओं की औसत विवाह आयु 23.4 वर्ष है और बाल विवाह की दर महज 1 प्रतिशत है. इन सभी पैमानों पर बेहतर होने के बाद भी लिंगानुपात का गिरना एक गंभीर पहेली है.
एक मुख्य वजह यह सामने आ रही है कि महाराष्ट्र में सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों पर निर्भरता बहुत ज्यादा है. राज्य में 40.9 प्रतिशत प्रसव निजी अस्पतालों में होते हैं, जो देश के बड़े राज्यों में केरल के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है. जानकारों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे की सामाजिक और तकनीकी वजहों की गहरी जांच होनी चाहिए ताकि समय रहते इस खाई को पाटा जा सके.