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अमेरिका की दादागिरी इस समय पूरी दुनिया देख रही है. डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उनके घर से उठवा लिया था. इस समय ट्रंप की नजरें ग्रीनलैंड पर हैं. दूसरे देशों पर वो जमकर टैरिफ लगा ही रहे हैं. ईरान में भी चल रही हिंसा को ट्रंप ने ही बढ़ावा दिया था. इस समय डोनाल्ड ट्रंप कुछ भी करने और बोलने के लिए खुद को स्वतंत्र मानते हैं और वो किसी भी नियम या फिर कानून को भी नहीं मानना चाहते हैं.

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अमेरिका की दादागिरी इस समय पूरी दुनिया देख रही है. डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उनके घर से उठवा लिया था. इस समय ट्रंप की नजरें ग्रीनलैंड पर हैं. दूसरे देशों पर वो जमकर टैरिफ लगा ही रहे हैं. ईरान में भी चल रही हिंसा को ट्रंप ने ही बढ़ावा दिया था. इस समय डोनाल्ड ट्रंप कुछ भी करने और बोलने के लिए खुद को स्वतंत्र मानते हैं और वो किसी भी नियम या फिर कानून को भी नहीं मानना चाहते हैं.

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आमतौर पर ऐसा तब ही होता है जब कोई देश बेहद मजबूत हो. उसकी करेंसी अच्छी हो, उसके यहां की सेना मजबूत हो और अभी के समय देखा जाए तो अमेरिका के पास ये सब कुछ है. इसके अलावा जो इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है वो अमेरिका के पास रखा सोना. जी हां, मिली खबरों के अनुसार, इस समय अमेरिका के पास सोने का भंडार है, जो उसे और भी ज्यादा मजबूती देता है. ऐसे में सवाल ये भी उठ रहा है कि आखिर भारत के पास कितना सोना है और अमेरिका के पास इतना सोना जमा कैसे हुआ. इन सब सवालों के जवाब आज हम जानेंगे.

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पूरी दुनिया ये जानती है कि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. अमेरिका के पास आज करीब 8,100 टन से ज्यादा सोना है, जो फोर्ट नॉक्स, न्यूयॉर्क फेड के वॉल्ट और कुछ अन्य रिजर्व लोकेशन्स पर रखा हुआ है. यह सोना अमेरिका के पास अचानक से नहीं आया है, बल्कि करीब 100 साल के दौरान अलग-अलग चरणों में यह सोना जमा हुआ है.

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बात करते हैं 19वीं सदी की तो, 19वीं सदी में अमेरिका में कई गोल्ड रश हुआ करते थे, जैसे कैलिफोर्निया गोल्ड रश (1848). बड़ी मात्रा में सोना घरेलू खदानों से निकला और फिर धीरे-धीरे ये सोना सरकार रिजर्व में पहुंचा.

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वहीं, पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यूरोप और बाकी देशों ने सुरक्षा और पेमेंट के लिए अमेरिका को सोना भेजा. युद्ध के समय हर एक देश को हथियारों, अनाज, तेल और दूसरी चीजों की जरूरत पड़ती थी और इनके भुगतान के लिए कई देश डॉलर या फिर सोने से पेमेंट करते थे. इसके अलावा कई देशों ने अपना गोल्ड रिजर्व भी अमेरिकी वॉल्ट्स में शिफ्ट कर दिया था.

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साल 1944 में ब्रेटन वुड्स समझौते के बाद डॉलर दुनिया की रेफरेंस करेंसी बन गया और उसे सोने से लिंक कर दिया गया. तब 1 औंस सोना = 35 यूएस डॉलर तय था. बाकी देश अपनी करेंसी को डॉलर से और डॉलर को सोने से जोड़ते थे. जिसके पास ज्यादा एक्सपोर्ट सरप्लस होता, उसके पास ज्यादा डॉलर आते और वो डॉलर के बदले अमेरिका से सोना ले सकता था लेकिन रियल पावर अमेरिका के पास ही रही. इस सिस्टम में दुनिया का बड़ा हिस्सा अपने गोल्ड रिजर्व, ट्रेड सरप्लस और सेफ्टी के लिए अमेरिका पर निर्भर हो गया, जिससे अमेरिका के पास सोने और डॉलर दोनों की ताकत आ गई.