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Salary Structure change from 1 April: वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत के साथ ही नौकरीपेशा लोगों की जिंदगी में बड़े बदलाव होने जा रहे हैं. 1 अप्रैल से नए सैलरी स्ट्रक्चर और इनकम टैक्स नियमों के प्रभावी होने की संभावना है. यदि सरकार के नए लेबर कोड (Labor Code) के प्रावधान लागू होते हैं, तो आपकी टेक-होम सैलरी से लेकर रिटायरमेंट फंड (PF) तक सब कुछ बदल जाएगा. इस बार सबसे बड़ा बदलाव 'वेजेज' की नई परिभाषा को लेकर है. नए नियम के अनुसार, किसी भी कर्मचारी की कुल सैलरी का कम से कम 50% हिस्सा बेसिक पे और उससे जुड़े कंपोनेंट्स में होना जरूरी है. इसका मतलब है कि कंपनियां बेसिक सैलरी बढ़ाएंगी और बाकी अलाउंसेस (जैसे स्पेशल अलाउंस) को कम या मर्ज कर सकती हैं. इससे PF और ग्रेच्युटी जैसे फायदे बढ़ेंगे, लेकिन इन-हैंड सैलरी पर थोड़ा असर पड़ सकता है.
सैलरी स्ट्रक्चर में सरल बदलाव

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सैलरी स्ट्रक्चर के सरल होने के साथ नया टैक्स रिजीम अब तेजी से डिफॉल्ट विकल्प बनता जा रहा है. अगर कोई कर्मचारी खुद से पुराना टैक्स रिजीम नहीं चुनता, तो उसे नए रिजीम में डाल दिया जाएगा. नए रिजीम में टैक्स रेट कम होते हैं, लेकिन अधिकतर छूट और डिडक्शन खत्म हो जाते हैं. इससे टैक्स सिस्टम सरल और समझने में आसान बनता है, खासकर उन लोगों के लिए जिनकी फाइनेंशियल प्लानिंग सीमित होती है.
पुराना टैक्स रिजीम भी विकल्प

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पुराना टैक्स रिजीम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और कई लोगों के लिए यह अब भी फायदेमंद साबित हो सकता है. खासकर वे लोग जिनकी आय 10 से 30 लाख रुपये के बीच है, जो मेट्रो शहरों में रहते हैं, अधिक किराया देते हैं या होम लोन चुका रहे हैं. साथ ही, जो 80C, NPS जैसी स्कीम्स में निवेश करते हैं, उन्हें पुराने रिजीम में ज्यादा टैक्स बचत मिल सकती है.
किसके लिए नया टैक्स रिजीम

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जिन लोगों के पास ज्यादा डिडक्शन क्लेम करने का विकल्प नहीं है या जिनकी सैलरी स्ट्रक्चर पहले से ही सरल है, उनके लिए नया टैक्स रिजीम बेहतर साबित होता है. इसमें कम कागजी प्रक्रिया और सीधी टैक्स गणना होती है, जिससे झंझट कम हो जाता है. फ्रीलांसर और कंसल्टेंट जैसे पेशेवर भी आमतौर पर इस विकल्प को पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें टैक्स प्लानिंग में ज्यादा समय नहीं लगाना पड़ता.
आने वाले समय की साफ तस्वीर

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आने वाले समय में सैलरी स्लिप और टैक्स सिस्टम दोनों अधिक सरल और पारदर्शी होने की दिशा में बढ़ रहे हैं. अलाउंसेस कम होंगे और सैलरी का ढांचा ज्यादा सीधा बनाया जाएगा. इससे कर्मचारियों को अपनी आय और टैक्स की गणना समझना आसान होगा. ऐसे में हर व्यक्ति को अपनी आय, खर्च और निवेश के आधार पर यह तय करना जरूरी होगा कि उसके लिए कौन सा टैक्स रिजीम ज्यादा फायदेमंद है.