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फाइटर जेट में इमरजेंसी इजेक्शन पायलट के लिए आखिरी ऑप्शन होता है. कुछ ही सेकंड में होने वाली ये प्रोसेस बेहद खतरनाक होती है, जिसमें तेज झटका, हाई स्पीड हवा और चोट का बड़ा खतरा होता है. जानिए इस दौरान पायलट किन परिस्थितियों से गुजरते हैं.
इजेक्शन क्या होता है?

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फाइटर जेट में इमरजेंसी इजेक्शन एक ऐसी हाई-टेक सिक्योरिटी प्रोसेस होती है, जिसमें पायलट अपनी जान बचाने के लिए कुछ ही सेकंड में विमान से बाहर निकलता है. जब जेट तकनीकी खराबी, दुश्मन हमले या कंट्रोल खोने जैसी स्थिति में होता है, तब इजेक्शन ही आखिरी ऑप्शन होता है. यह सिस्टम बेहद एडवांस्ड होता है, जिसमें सीट, पैराशूट और ऑटोमैटिक सेफ्टी मैकेनिज्म शामिल होते हैं, जो पायलट को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए डिजाइन किए जाते हैं.
सेकंडों में लेना होता है सबसे बड़ा फैसला

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इजेक्शन का फैसला पायलट के करियर का सबसे कठिन और जोखिम भरा फैसला होता है. उसे कुछ ही सेकंड में यह तय करना होता है कि विमान को बचाने की कोशिश जारी रखनी है या अपनी जान बचानी है. देर करने पर ऊंचाई कम हो सकती है या विमान क्रैश हो सकता है, जिससे इजेक्शन नामुमकिन हो जाता है. इसलिए पायलट्स को ऐसी परिस्थितियों के लिए बार-बार ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वो तुरंत और सही फैसला ले सकें.
रॉकेट जैसी ताकत से बाहर फेंकी जाती है सीट

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जैसे ही पायलट इजेक्शन हैंडल खींचता है, सीट में लगे रॉकेट मोटर एक्टिव हो जाते हैं और पायलट को बेहद तेज स्पीड से ऊपर की ओर फेंक देते हैं. ये प्रोसेस इतनी तेज होती है कि शरीर पर 10 से 14 गुना तक ग्रेविटेशन फोर्स पड़ता है. इस झटके से शरीर पर भारी दबाव पड़ता है, खासकर रीढ़ और गर्दन पर, लेकिन ये तेज स्पीड ही पायलट को विमान से सुरक्षित दूरी तक पहुंचाती है.
कैनोपी हटने के बाद शुरू होता है असली इजेक्शन

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इजेक्शन के दौरान सबसे पहले कॉकपिट का कवर यानी कैनोपी हटाया या तोड़ा जाता है. इसके बिना पायलट बाहर नहीं निकल सकता. मॉडर्न जेट्स में ये प्रोसेस ऑटोमैटिक होती है, जिसमें विस्फोटक चार्ज या मैकेनिकल सिस्टम कैनोपी को तुरंत अलग कर देता है. इसके तुरंत बाद सीट बाहर निकलती है, जिससे पायलट को टकराव से बचाया जा सके.
तेज हवा और स्पीड से शरीर पर असर

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विमान से बाहर निकलते ही पायलट को बेहद तेज हवा का सामना करना पड़ता है, जिसकी रफ्तार सैकड़ों किलोमीटर प्रति घंटा हो सकती है. यह हवा शरीर पर जबरदस्त दबाव डालती है और अगर पायलट सही पोजिशन में न हो, तो गंभीर चोट लग सकती है. हवा की ताकत इतनी होती है कि हेलमेट और सूट के बावजूद शरीर को नुकसान पहुंच सकता है.
पैराशूट खुलने तक का समय सबसे खतरनाक

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इजेक्शन के बाद शुरुआती कुछ सेकंड बेहद खतरनाक होते हैं. इस दौरान पायलट सीट के साथ तेज स्पीड से ऊपर जाता है और फिर नीचे गिरना शुरू करता है. सही समय पर पैराशूट का खुलना जरूरी होता है. अगर पैराशूट समय पर न खुले या सिस्टम में गड़बड़ी हो जाए, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है.
रीढ़ और शरीर पर गंभीर चोट का खतरा

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इजेक्शन के दौरान लगने वाला झटका इतना शक्तिशाली होता है कि पायलट की रीढ़ (स्पाइन) पर सीधा असर पड़ता है. कई मामलों में पायलट्स को पीठ दर्द, फ्रैक्चर या लंबे समय तक चलने वाली चोटें हो जाती हैं. इसके अलावा हाथ-पैर और गर्दन पर भी असर पड़ता है. इसलिए पायलट्स को खास तरह की शारीरिक फिटनेस और सुरक्षा गियर दिया जाता है.
सुरक्षित लैंडिंग भी आसान नहीं होती

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पैराशूट खुलने के बाद भी खतरा खत्म नहीं होता. पायलट को जमीन पर सुरक्षित उतरने के लिए सही दिशा और जगह चुननी होती है. अगर वह पानी, जंगल या दुश्मन इलाके में उतरता है, तो उसकी मुश्किलें बढ़ जाती हैं. हवा की दिशा और स्पीड भी लैंडिंग को प्रभावित करती है, जिससे चोट लगने का खतरा बना रहता है.
सर्वाइवल किट और ट्रेनिंग बनती है सहारा

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हर पायलट के पास इजेक्शन के बाद इस्तेमाल के लिए एक सर्वाइवल किट होती है. इसमें पानी, खाना, मेडिकल सामान, रेडियो और लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस शामिल होते हैं. इसके अलावा पायलट्स को जंगल, समुद्र और दुश्मन इलाके में जीवित रहने की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वो बचाव टीम आने तक खुद को सुरक्षित रख सकें.
(All Photos Credit: Social Media)