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5 स्टार होटल हो या फिर कोई शाही डिश, पनीर हर व्यंजन की शान होता है. आज भील जब किसी के घर पर कोई दावत हो या फिर घर में मेहमान आने वाले हो तो घर के खाने के मेन्यू में पनीर शामिल ना हो, ऐसा मुमकिन नहीं होता है. बिना पनीर के मेन्यू अधूरा ही लगता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर पनीर क्यों बनाया गया था और क्या सोच कर बनाया गया था?
आज जिस पनीर को हम एक लग्जरी के रूप में देखते हैं वहीं पनीर एक समय मजबूरी वाला खाना माना जाता था क्योंकि इसका आविष्कार मजबूरी में हुआ था.
किचन के मेन्यू में शाही होता है पनीर

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आज जिस पनीर को हम एक लग्जरी के रूप में देखते हैं वहीं पनीर एक समय मजबूरी वाला खाना माना जाता था क्योंकि इसका आविष्कार मजबूरी में हुआ था.
(फोटो- National Historic Cheesemaking Center Museum)
कैसे रसोई तक पहुंचा पनीर?

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दरअसल, एक रिपोर्ट में ऐसा दावा किया गया है कि पनीर की उत्पत्ति किसी तरह के रॉयल किचन में नहीं बल्कि लंबी यात्रा पर जा रहे लोगों की जरूरतों को देखते हुए हुआ था. लेकिन समय के साथ पनीर का रंग रूप बदला और आज हालात ये हैं कि पनीर हर किचन में शाही डिश की एक पहचान बन चुका है. आइए जानते हैं कि विदेशी प्रभाव, मुगल दरबार और देसी जुगाड़ से शुरू होकर पनीर हमारे और आपके किचन तक कैसे पहुंचा.
(फोटो- National Historic Cheesemaking Center Museum)
कैसे हुआ था पनीर का जन्म?

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नेशनल हिस्टोरिक चीजमेकिंग सेंटर म्यूजियम (NHCC) की ऑफिशियल वेबसाइक के मुताबिक, पनीर और इसे बनाने की शुरुआत कब और कहां हुई, इसकी सटीक जानकारी किसी के पास नहीं है लेकिन पनीर का इतिहास करीब 8,000 से 10,000 साल पुराना है. प्राचीन यूनानी स्टोरी में भी पनीर बनाने की स्किल्स का जिक्र मिलता है, जबकि मिस्त्र के 4000 साल पुराने मकबरों पर भी इसके प्रमाण पाए गए हैं.
(फोटो- National Historic Cheesemaking Center Museum)
लंबी यात्रा के लिए थैली में भरा था दूध

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ऐसा माना जाता है कि हजारों साल पहले मिडिल ईस्ट या मिडिल एशिया का एक चरवाहा एक लंबे सफर पर निकला था. इस दौरान चरवाहे ने जानवरों की खाल से बनी एक थैली में दूध को अपने साथ रख लिया था. लेकिन रास्ते में तेज गर्मी और थैली में मौजूद प्राकृतिक एंजाइम ने दूध को फाड़ दिया और उसके मोटे-मोटे थक्के जमा दिए और इसमें से पानी को भी अलग कर दिया. जब चरवाहे ने ये देखा और तेज भूख के कारण चरवाहे ने उस जमे हुए हिस्से को ही खा लिया. इस दौरान चरवाहे ने पाया कि वो जमा हुआ हिस्सा भी खाने में अच्छा लग रहा था. बस इसे ही पनीर का प्रारंभिक जन्म माना गया.
(फोटो- National Historic Cheesemaking Center Museum)
समय के साथ हुआ तकनीक में सुधार

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पनीर के जन्म के पीछे एक थ्योरी और है. इस थ्योरी के अनुसार, दूध को खराब होने से बचाने के लिए उसमें नमक मिलाया गया होगा जिसके कारण वह जम गया. इसके अलावा दूध में फलों का रस मिलाने से उसमें मौजूद एसिड की वजह से भी पनीर बनने की शुरुआत हुई होगी.
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की एक रिपोर्ट भी इस दावे को सही मानती है कि प्राचीन काल में मध्य पूर्व (Middle East) के खानाबदोश लोग यात्रा के दौरान दूध को स्टोर करने के लिए जानवरों के पेट से बनी खाल के थैलों का इस्तेमाल करते थे और उसी समय पनीर बना था.
(फोटो- National Historic Cheesemaking Center Museum)
भारत में कैसे हुई पनीर की शुरुआत?

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खबरों के अनुसार, भारत में हमेशा से ही दूध के फटने को अपशकुन समझा जाता था. वहीं, भारत में आधुनिक पनीर का श्रेय पुर्तगालियों को दिया जाता है. 17वीं शताब्दी के आसपास बंगाल में बसे पुर्तगालियों ने भारतीयों को दूध फाड़ने की तकनीक सिखाई थी.
उन्होंने सिखाया कि सिट्रिक एसिड या नींबू के रस की मदद से दूध को फाड़कर उसे छेना या पनीर में बदला जा सकता है. इससे पहले भारत में दही या खोया का चलन तो था लेकिन 'छेना' बनाने का तरीका नया था. इस तकनीक ने आगे चलकर रसगुल्ला, संदेश और पनीर की ढेरों वैराइटीज को जन्म दिया.
(फोटो- National Historic Cheesemaking Center Museum)