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Female Naga Sadhvi: कुंभ में दिखने वाले नागा साधुओं की तरह एक गुप्त महिला शाखा भी है, जिन्हें ‘माई’ कहा जाता है. इनका जीवन कठोर तप, हिमालय की गुफाओं और कड़े नियमों में बीतता है. आइए जानते हैं, कैसी है नागा साध्वियों की रहस्यमय दुनिया?
महिला नागा साधुओं का जीवन

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Female Naga Sadhvi: जब कुंभ मेले की सड़कों पर भभूति रमाए नागा साधु बिजली की तरह कौंधते हैं, तब यह जानने वाले बहुत कम हैं कि इस योद्धा संन्यास परंपरा में एक गोपनीय और तप से भरी महिला शाखा भी मौजूद है. ये महिला नागा साधु या ‘माई’ कहलाती हैं. इनका जीवन पुरुष नागाओं से भी अधिक कठोर नियमों में बंधा होता है और अधिकांश समय हिमालय की गुफाओं में व्यतीत होता है. इनके बारे में कुछ ऐसे तथ्य हैं जो किसी चमत्कार से कम नहीं है.
जीते जी पिंडदान

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दीक्षा से पहले एक अत्यंत गोपनीय अनुष्ठान ‘बिरजा होम’ किया जाता है. इसमें साध्वी अपने जीवित रहते स्वयं तथा परिवार की सात पीढ़ियों का पिंडदान करती है. इस क्रिया के पूर्ण होते ही वह सामाजिक दृष्टि से मृत घोषित हो जाती है और अखाड़ा उसे आध्यात्मिक रूप से नया जन्म देता है.
हाथों से खींचकर हटाए जाते हैं बाल

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सिर के सभी बाल हाथों से खींचकर या मुंडन द्वारा हटाए जाते हैं. दीक्षा की रात शिखा काटकर पवित्र नदी में बहा दी जाती है. इसके बाद साध्वी जीवनपर्यंत जटाएं धारण करती है, जो संसार से विरक्ति का प्रबल चिह्न हैं.
बिना सिला 35 मीटर का 'गंती'

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पुरुष नागाओं की भांति दिगंबर रहने के स्थान पर ये महिलाएं एक विशेष बिना सिला 35 मीटर लंबा गेरुआ वस्त्र धारण करती हैं जिसे ‘गंती’ कहते हैं. इसे शरीर पर एक रहस्यमय गांठ ‘ब्रह्म गाथी’ से लपेटा जाता है. यह गांठ ही उनके ब्रह्मचर्य और संन्यास जीवन का सबसे गूढ़ प्रतीक मानी जाती है.
बर्फीली गंगा में स्नान

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इनका दिन तड़के तीन से साढ़े तीन बजे के बीच शुरू होता है. हिमालय की बर्फीली गंगा में स्नान के बाद दिन भर में एक बार मात्र फल, कंदमूल या जड़ी-बूटियों का आहार लिया जाता है. सबसे सख्त नियम है कि दीक्षा के बाद ये साध्वी कभी किसी व्यक्ति के सामने सिर नहीं झुकातीं. केवल इष्टदेव और अपने गुरु को छोड़कर किसी को नहीं. इसे अहंकार-विहीन आत्म-ज्ञान का परिचायक माना जाता है.
माई बाड़ा: 13वें अखाड़े की शक्ति

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वर्ष 2013 के महाकुंभ तक ये साध्वियां मुख्यतः जूना अखाड़े का हिस्सा थीं, लेकिन लंबे संघर्ष के बाद ‘श्री पंचायती अखाड़ा माई बाड़ा’ को स्वतंत्र अखाड़े के रूप में मान्यता मिली. यह 13वां अखाड़ा बना. यहां इन्हें ‘अवधूतनी’, ‘नागिन’ और ‘माता’ कहा जाता है. स्वयं पुरुष नागा भी इन्हें ‘माता’ कहकर ही संबोधित करते हैं. अब इनका अपना महंत और शाही जुलूस में अग्रिम पंक्ति का अधिकार है.
गहरी तप-परीक्षा और श्मशान साधना

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नागा साध्वी बनने की राह आसान नहीं. 10 से 15 वर्ष की कठोर ब्रह्मचर्य परीक्षा और गुरु-अनुशासन में तपना अनिवार्य है. साथ ही ये श्मशान साधना में गहरी रत रहती हैं, जहां शरीर पर चिता की भस्म लगाकर शिव की आराधना करती हैं. मान्यता है कि इससे मृत्यु-भय से मुक्ति और दिव्य ऊर्जा की प्राप्ति होती है.
केवल कुंभ में होता दिव्य दर्शन

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ये साध्वियां वर्ष भर जनसमूह से दूर हिमालय की अज्ञात गुफाओं में रहती हैं. साधारण श्रद्धालु इन्हें मुख्यतः कुंभ या महाकुंभ के शाही स्नान के समय ही देख पाते हैं. यह गोपनीयता ही इन्हें एक सजीव रहस्य बनाए रखती है.