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First Fruit of World: कुछ दिनों बाद फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी मनाया जाएगा, जिसे आंवला एकादशी भी कहते हैं। इसकी वजह यह है कि इस एकादशी में भगवान विष्णु के साथ आंवले के वृक्ष और फल की विशेष पूजा की जाती है। क्या आप जानते हैं, हिन्दू धर्म में आमला यानी आंवला को इतना अधिक महत्व क्यों दिया जाता है? आइए विस्तार से जानते हैं, आंवला की कहानी...

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अमृत फल फल है आंवला - सनातन धर्म में आंवला को बहुत ही पवित्र और सम्मानित फल माना जाता है। यह सिर्फ एक साधारण फल नहीं है, बल्कि धार्मिक और आयुर्वेदिक दोनों दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। इसके औषधीय गुण इतने लाभकारी माने गए हैं कि इसे “अमृत फल” कहा जाता है। वहीं, इसे “आदि वृक्ष” यानी पहला पूजनीय वृक्ष माना गया है और कई व्रत, पूजा और धार्मिक अवसरों पर आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है।

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आंवला को क्यों कहते हैं 'आदिरोह'? - 'आदिरोह' आंवले के पेड़ का एक बहुत पुराना नाम है। माना जाता है कि यह संसार के सबसे पहले उत्पन्न हुए वृक्षों में से एक है। यह शब्द दो भागों से मिलकर बना है- ‘आदि’ जिसका अर्थ है सबसे पहला, और ‘रोह’ जिसका अर्थ है उगना या पैदा होना। यानी आदिरोह का मतलब हुआ- 'सबसे पहले उगने वाला वृक्ष।' धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आंवले का पेड़ न केवल भगवान विष्णु बल्कि ब्रह्मा और शिव को भी बहुत प्रिय है। इसी कारण इसे पवित्र और विशेष महत्व वाला वृक्ष माना जाता है।

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क्यों सृष्टि का पहला फल है आंवला? - आमला या आंवला को सृष्टि का पहला फल कहा जाता है। जी हां, कहते हैं जब सृष्टि की रचना हो रही तब ब्रह्मा जी ने सबसे पहले जिस फल की रचना की, वह आंवला ही था। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय ऐसा था जब पूरी पृथ्वी जल से ढकी हुई थी। उस समय ब्रह्माजी कठोर तपस्या कर रहे थे। उनकी भक्ति और तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। भगवान विष्णु के दर्शन करके ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। खुशी के कारण उनकी आंखों से आंसू बह निकले। कहा जाता है कि जब वे आंसू धरती पर गिरे, तो उसी से आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई। इस कथा के कारण आंवले के पेड़ को बहुत पवित्र और दिव्य माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि यह वृक्ष भगवान की कृपा और आशीर्वाद पाने का माध्यम है।

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त्रिदेव का वास - पद्म पुराण में बताया गया है कि आंवले का पेड़ भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है। ग्रंथों में यह वर्णन भी मिलता है कि इस वृक्ष के हर भाग को देवताओं से जुड़ा माना गया है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, इसकी जड़ में भगवान विष्णु का निवास होता है, तने में भगवान शिव का वास माना जाता है और और इसके ऊपरी भाग में ब्रह्मा जी का निवास बताया गया है। इसी कारण आंवले के वृक्ष को बहुत पवित्र मानकर उसकी पूजा की जाती है और उसे विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है।

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मां लक्ष्मी ने की आंवले की पहली पूजा - एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता लक्ष्मी धरती पर घूमने आईं। उनके मन में इच्छा हुई कि वे एक साथ भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा करें। भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय है और भगवान शिव को बेलपत्र। माता लक्ष्मी सोचने लगीं कि ऐसी कौन-सी चीज है जिसमें दोनों की पसंद और गुण एक साथ मिल जाएं। उन्हें आंवला ऐसा फल लगा जिसमें दोनों देवताओं के गुण समाए हुए हैं। इसलिए उन्होंने पहली बार आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भगवान विष्णु और भगवान शिव की एक साथ पूजा की। वहीं पर उन्होंने भोजन भी बनाया और श्रद्धा से दोनों देवों को भोग अर्पित किया।

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आंवले से जुड़े व्रत-त्योहार - हिंदू धर्म में आंवले का विशेष महत्व है और इससे मुख्य रूप से दो बड़े व्रत-त्योहार जुड़े हुए हैं। ये हैं: अक्षय नवमी और आमलकी एकादशी। अक्षय नवमी आंवले से जुड़ा सबसे प्रमुख त्योहार है, जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। इस साल यह 18 नवंबर, 2026 को मनाया जाएगा। वहीं, आमलकी एकादशी फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है और इस दिन भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष की विशेष पूजा कर भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करते हैं। इस साल यह 27 फरवरी को मनाया जाएगा।