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क्या आप जानते हैं कि एक रिफ्यूजी कैंप में रहने वाला लड़का कभी किसी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी बन सकता है? जी हां, जरा सोचिए जो खुद एक कैंप में अपने दिन-रात काट रहा है, लेकिन किसी दूसरे देश में जाकर वो वहां का सबसे अमीर व्यक्ति बन जाता है. हम बात कर रहे हैं सुधीर रूपारेलिया की.
पूर्वी अफ्रीका के सबसे सफल उद्यमियों में से एक हैं सुधीर रूपारेलिया. रूपारेलिया ग्रुप के संस्थापक और चेयरमैन सुधीर (Ruparelia Group Success Story) की सफलता की कहानी भारत के गुजरात के तटों से होकर हिंद महासागर को पार करते हुए पूर्वी अफ्रीका तक पहुंचती है. यह कहानी सिर्फ एक कारोबारी के सफर की नहीं, बल्कि यह तानाशाही, निर्वासन और फिर से उठने की एक कहानी है.
कैसे शुरू किया भारत से युगांडा का पारिवारिक सफर?

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रूपारेलिया परिवार की कहानी साल 1897 में गुजरात के पोरबंदर से शुरू होती है. सुधीर के परदादा एक नाव में सवार होकर केन्या के मोम्बासा पहुंचे थे. बेहतर भविष्य की तलाश में उन्होंने यह लंबा सफर तय किया था. 1903 तक उनका परिवार ब्रिटिश संरक्षित युगांडा के भीतरी इलाकों में बस चुका था.
उनके दादा का जन्म 1908 में और पिता का जन्म 1932 में युगांडा में ही हुआ था. परिवार ने जिंजा में एक छोटा व्यापारिक स्टोर और बाद में एक पेट्रोल भी खोला. सुधार ने बताया कि 'उस समय कहा जाता था कि अफ्रीका में इतनी जमीन है कि एक बाड़ का खंभा भी जड़ पकड़ लेगा.'
16 साल की उम्र में ही क्यों छोड़ना पड़ा देश?

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1972 में युगांडा के तत्कालीन तानाशाह ईदी अमीन (Idi Amin) ने एशियाई समुदाय को देश से बाहर निकालने का आदेश दिया था. उस समय उनके परिवार का व्यापार और शांति दोनों पर बुरा असर पड़ा था. ईदी अमीन के आदेश पर 90 दिनों के अंदर 60,000 से ज्यादा लोगों को अपना घर और व्यापार छोड़कर भागना पड़ा था. उस समय सुधीर महज 16 साल के थे. उनके माता-पिता यूनाइटेड किंगडम (UK) भाग गए लेकिन सुधीर कुछ समय वहीं रुके. बाद में उन्हें भी लंदन जाना पड़ा, जहां उन्होंने हजारों युगांडा-एशियाई शरणार्थियों के साथ जीवन की नई शुरुआत की.
लंदन में बीते संघर्ष भरे दिन

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लंदन में उन्होंने एक फैक्ट्री में टेस्ट ट्यूब पर पिघला हुआ मोम लगाने का काम किया, जिसे वे अपनी जिंदगी का सबसे भयानक काम बताते हैं. भयंकर गर्मी और बिना किसी सुरक्षा उपकरण के काम करते हुए वे वहां सिर्फ 5 महीने ही काम कर सकें. जिसके बाद उन्हें ये काम छोड़ना पड़ा. इन कठिन दिनों से उन्होंने अनुशासन सीखा. उन्होंने छोटे रियस एस्टेट सौदों (प्रॉपर्टी खरीदने, सुधारने और बेचने) में हाथ आजमाया और 1985 तक 25,000 डॉलर की बचत की.
मकान मालिक ने खड़ी की 200 से ज्यादा कंपनियां

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1980 के दशक के बीच में जब युगांडा से तानाशाही खत्म हुई तो सुधीर अपनी जमा-पूंजी के साथ वापस लौट आए. युद्ध और आर्थिक पतन से जूझ रहे युगांडा में उन्हें अवसर नजर आया.
उन्होंने शुरू में केन्या से बीयर, नमक और वाइन आयात करके एक छोटा थोक व्यापार शुरू किया.
अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद उन्होंने युगांडा का पहला लाइसेंस प्राप्त क्रेन फॉरेक्स ब्यूरो खोला. 1995 में 1 मिलियन डॉलर की पूंजी के साथ क्रैन बैंक की स्थापना की जो एक दशक के भीतर देश का दूसरा सबसे बड़ा निजी बैंक बन गया.
आज के समय है कितनी संपत्ति?

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मिली जानकारी के अनुसार, साल 2023, नवंबर तक उनकी कुल संपत्ति 1.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई थी. आज रूपारेलिया ग्रुप के तहत 200 से अधिक कंपनियां हैं. इनमें होटल (Speke Group), शिक्षा (Victoria University, Kampala Parents School), रियल एस्टेट और कृषि (Premier Roses) शामिल हैं. कंपाला के शहरी परिदृश्य में उनके भारी प्रभाव के कारण उन्हें कंपाला का मकान मालिक कहा जाता है.
बेटे की हुई कार एक्सीडेंट में मौत

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यूं तो सुधीर रूपारेलिया ने बिजनेस में कई उतार-चढ़ाव देखे लेकिन उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी और दर्दनाक घटना 3 मई 2025 को हुई. सुधीर के इकलौते बेटे और उनके साम्राज्य के उत्तराधिकारी राजीव रूपारेलिया की कंपाला में एक कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई. उस समय राजीव की उम्र सिर्प 35 साल थी. राजीव ने लंदन से पढ़ाई की थी और वे रूपारेलिया ग्रुप के प्रबंध निदेशक थे.
राजीव रूपारेलिया बर्सरी की हुई स्थापना

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सुधीर और ज्योत्सना ने अपने इकलौते बेटे राजीव की मृत्यु के बाद अपने दुख को एक उद्देश्य में बदल दिया. उन्होंने शिक्षा और युवाओं के उत्थान के प्रति अपने बेटे के जुनून को जिंदा रखने का फैसला लिया. विक्टोरिया यूनिवर्सिटी के 9वें दीक्षांत समारोह में दंपत्ति ने राजीव रूपारेलिया बर्सरी की स्थापना का ऐलान किया. कंपाला की बड़ी-बड़ी इमारतें आज भी इस कारोबारी के आर्थिक साम्राज्य की गवाही देती हैं.