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भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर महज एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और अटूट आस्था का प्रतीक है. इतिहास की किताबों में सोमनाथ का नाम 'बरकत' और 'विनाश' दोनों का प्रतीक माना जाता है. एक तरफ इसकी अकूत धन संपत्ति थी, जिसने दुनियाभर के लुटेरों को आकर्षित किया, तो दूसरी तरफ इसकी वो शक्ति थी जो हर बार मलबे से निकलकर फिर से शिखर खड़ा कर देती थी. आइए आज हम मिलकर इतिहास के कुछ पन्नों को पलटते हैं और जानेंगे इस मंदिर की कहानी जो खजाने से भरा रहा है, जिसे मिटाने की तो बहुत कोशिशें हुई लेकिन उसका अस्तित्व कभी कोई खत्म नहीं कर सका.
क्या हुआ था 1000 हजार साल पहले?

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आज से ठीक 1000 साल पहले की बात है. 6 जनवरी 1026 को सोमनाथ ने अपने इतिहास का सबसे खौफनाक मंजर देखा था. गजनी का सुल्तान महमूद गजनवी, जिसने पहले ही कश्मीर, ग्वालियर, मथुरा में तबाही मचा चुका था, अपनी 30 हजार घुड़सवारों की सेना लेकर सोमनाथ के द्वार पर खड़ा था. उस समय मंदिर की भव्यता का नजारा ये था कि वहां हजारों ब्राह्मण पूजा-पाठ में हर समय लीन रहते थे, सैकड़ों नर्तकियां और संगीतकार मंदिर की सेवा में लगे रहते थे. गजनवी के इतिहासकारों ने लिखा है कि जब वो मंदिर के भीतर पहुंचा तो वहां की रत्नजड़ित दीवारों और सोने की जंजीरों को देखकर उसकी आंखे चौंधिया गईं. 15 दिनों तक चले भीषण संघर्ष और कत्लेआम के बाद गजनवी ने मंदिर को न सिर्फ लूटा बल्कि उसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया.
गजनवी से सोमनाथ मंदिर से क्या-क्या लूटा?

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विदेशी इतिहासकार रणबीर वोहरा और मिन्हाज-ए-सिराज के अनुसार, गजनवी यहां से करीब 6.5 टन सोना और बेशकीमती हीरे-जवाहरात ऊंटों पर लादकर ले गया था. इस दौरान हुए हमले में करीब 50,000 हिंदुओं ने मंदिर की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी.
सोमानाथ मंदिर में हवा में तैर रहा था शिवलिंग

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क्या आपने कभी अपनी आंखों के सामने हवा में तैरते शिवलिंग देखा है? सोमनाथ में जब हमलावर पहुंचे थे तो उन्होंने हवा में तैरते शिवलिंग को देखा. सोमनाथ के ये किस्सा बहुत फेमस है. गजनवी के साथ आए यात्रियों और फारसी लेखक अल काजविनी ने अपनी डायरी में लिखा है कि मंदिर के गर्भगृह में मुख्य शिवलिंग बिना किसी सहारे के हवा में अधर में लटका हुआ था. ये नजारा देखकर हमलावर भी दंग रह गए थे.
कितनी बार लूटा गया सोमनाथ मंदिर को?

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इतिहास बताता है कि महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को करीब 17 बार लूटा था, लेकिन सोमनाथ का इतिहास बताता है कि इसे केवल गजनवी ने ही नहीं, बल्कि समय-समय पर कई इस्लामी आक्रांताओं ने निशाना बनाया था, लेकिन हर विनाश के बाद एक नया निर्माण हुआ. इस पर सबसे पहला हमला 725 ईं. में हुआ, जब सिंध के अरब गवर्नर अल जुनैद ने इसे पहली बार तोड़ा था. गजनवी की लूट 1025-26 ईं. का सबसे बड़ा हमला माना जाता है. 1299 ई. में दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दी खिलजी के सेनापति उलुघ खान ने हमला किया और संपत्ति लूटी.
मुगल बादशाह ने भी दिया था मंदिर को तोड़ने का आदेश

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बता दें कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने भी इसे दो बार तोड़ने का आदेश दिया था. एक बार 1665 में और फिर 1706 ई. में, ताकि वहां फिर कभी पूजा न की जा सके. हर बार मंदिर टूटा, लेकिन प्रतिहार राजाओं, चालुक्य वंश के भीमदेव, राजा भोज और अहिल्याबाई होलकर जैसे शासकों ने इसे फिर से खड़ा किया.
किसने बनवाया था आधुनिक मंदिर ?

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आजादी के बाद 13 नवंबर 1947 को भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल सोमनाथ पहुंचे थे. वहां के खंडहरों को देखकर उनका हृदय भर आया था. इसके बाद उन्होंने समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प किया कि 'जब तक इस भव्य मंदिर का पुनरुद्धार नहीं हो जाता, तब तक मेरा काम अधूरा है.' महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि इसके निर्माण के लिए सरकारी पैसा नहीं, बल्कि जनता का चंदा इस्तेमाल होना चाहिए. तत्कालीन मंत्री और लेखक केएम मुंशी की देखरेख में ट्रस्ट बना और 1951 में मौजूदा भव्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ. पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसकी प्राण-प्रतिष्ठा की थी.
सोमनाथ मंदिर का वैभव

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आज का सोमनाथ मंदिर मारू-गुर्जर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है. इसके मुख्य शिखर पर 10 टन वजन का स्वर्ण-जड़ित कलश स्थापित है. मंदिर के भीतर और बाहर की नक्काशी ऐसी है जो पर्यटकों को आज भी आकर्षित करती है.