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आज के दौर में तो जब लोगों को विदेश की यात्रा करनी होती है तो वे हवाई यात्रा का ही विकल्प चुनते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है पुराने जमाने में जब हवाई यात्रा थी ही नहीं तो लोग भारत से ईरान की यात्रा कैसे करते होंगे? दरअसल, एक दौर ऐसा भी था जब भारत से सीधे सड़क के रास्ते और उससे भी आगे तक का सफर तय किया जा सकता था. 1950 से 1970 के दशक के बीच भारत और ईरान न केवल एक मजबूत व्यापारिक साझेदारी से जुड़े हुए थे, बल्कि इनके बीच नियमित तौर पर बसें भी चलती थीं
यात्रियों के लिए रोमांच का अहसास

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बता दें कि ये बसें पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रास्ते से होकर गुजरती थी और यात्रियों के लिए ये एक अलग ही रोमांच का अहसास होता था. आइए इस ऐतिहासिक सड़क मार्ग, बस सेवा और इसके किराए के दिलचस्प सफरनामे को विस्तार से जानते हैं.
किन रास्तों से जाते थे ईरान?

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साल 1957 से 1976 के बीच भारत से ईरान होते हुए लंदन तक एक बहुत ही प्रसिद्ध और नियमित बस सेवा चलती थी, जिसे इंडियामैन के नाम से जाना जाता था. यह बस उस समय के साहसिक यात्रियों और हिप्पी आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय थी. यह बस कोलकाता से अपना सफर शुरू करती थी और दिल्ली होते हुए पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान पहुंचती थी. इसके बाद यह बस ईरान की राजधानी तेहरान और अन्य मुख्य शहरों से गुजरती थी.
कहां-कहां से जाती थी ये बस?

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बता दें कि यह बस तुर्की, बुल्गारिया, यूगोस्लाविया, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, बेल्जियम होते हुए सीधे ब्रिटेन की राजधानी लंदन पहुंचती थी. यह पूरा रास्ता 'हिप्पी ट्रेल' के नाम से दुनिया भर में मशहूर था, जिसने दोनों देशों के बीच के जमीनी रास्तों को जीवंत रखा था.
पचास दिनों का होता था सफर

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यह बस सेवा सिर्फ एक यात्रा ही नहीं बल्कि अपने आप में एक चलता-फिरता होटल थी. कोलकाता से लंदन तक का यह सफर करीब 32,000 किलोमीटर लंबा होता था, जिसे पूरा करने में लगभग 50 दिनों का समय लगता था. यात्रियों की सुविधा के लिए इस विशेष बस में सोने के लिए आरामदायक बर्थ और एक छोटी सी रसोई भी होती थी. उस समय इस पूरी यात्रा का किराया लगभग 145 पाउंड तय किया गया था. सफर के दौरान रास्ते में जितने भी ऐतिहासिक और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल आते थे, यह बस वहां रुकती थी, ताकि यात्री आराम से घूम सकें. इस दौरान इंडियामैन के अलावा करीब 32 अन्य बस ऑपरेटर भी इसी रूट पर अपनी सस्ती बसें चलाते थे.
व्यापारिक साझेदारी और क्रेडिट पर मिलता था तेल

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सड़क मार्ग से सिर्फ बसें ही नहीं चलती थीं, बल्कि भारत और ईरान के बीच एक बहुत मजबूत व्यापारिक गलियारा भी मौजूद था. साल 1974 में हुए एक ऐतिहासिक आर्थिक समझौते के बाद ईरान भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया था. उस दौर में भारत अपनी जरूरत का कुल 60 से 65 प्रतिशत कच्चा तेल अकेले ईरान से ही आयात करता था. सबसे खास बात यह थी कि तेल की बढ़ती कीमतों के बोझ से भारत को बचाने के लिए ईरान की ओर से क्रेडिट यानी उधारी पर भी तेल देने का प्रावधान था. इस व्यापारिक सड़क मार्ग ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने में उस दौर में सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
बदले में होता था भारतीय सामानों का निर्यात

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इस साझेदारी के तहत यह सड़क मार्ग दोतरफा व्यापार का जरिया बना हुआ था. ईरान से तेल मांगने के बदले में भारत इसी जमीनी रास्ते और अन्य माध्यमों से सीमेंट, स्टील उत्पाद, रेलवे के डिब्बे, भारी मशीनरी और यहां तक कि मछली पकड़ने की नौकाएं (फिशिंग ट्रॉलर) ईरान को निर्यात करता था. इससे भारत की निर्यात आय को बहुत बड़ा सहारा मिला था. इसके अलावा ईरान ने भारत में कई बड़े निवेशों का वादा किया था, जिसमें दक्षिण भारत की लौह अयस्क परियोजना, ओडिशा का एक एल्यूमिना प्लांट और राजस्थान की नहर परियोजना शामिल थी. यह एक ऐसा अनूठा मॉडल था जिसके तहत ईरान के पैसे से भारत में बुनियादी ढांचा तैयार होता था और बदले में वहां उत्पादित माल ईरान को भेजा जाता था.
ऐतिहासिक रास्ते का हुआ अंत

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यह व्यापारिक और सड़क साझेदारी अचानक एक बड़े वैश्विक भू-राजनीतिक बदलाव के कारण हमेशा के लिए बंद हो गई. साल 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति और शाह के शासन के अंत के साथ ही दोनों देशों के बीच सभी पुराने समझौते चरमरा गए. ईरान के भीततर उपजी राजनीतिक अराजकता और अस्थिरता के कारण यह सड़क मार्ग पूरी तरह से ठप हो गया. इसके साथ ही सुरक्षा कारणों और पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव के कारण भी भारत से ईरान होते हुए लंदन जाने वाली बसें हमेशा के लिए थम गई. आज यह रास्ता सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही सिमट चुका है.