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आपने कभी न कभी ट्रेन की यात्रा जरूर की होगी। कई लोग तो नियमित रूप से ट्रेन की यात्रा करते हैं क्योंकि भारतीय ट्रेन भारत के यातायात की रीढ़ है। पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक रेल की कनेक्टिवटी है। ट्रेन के साथ ही ट्रेन के पहिओं को आपने खूब गौर से देख होगा। पटरी बदलते समय आपका ध्यान पहिओं पर जाता होगा। गोल-गोल और बड़े-बड़े चक्कों को आप ट्रेन का भार सहते देखते होंगे। इतना मजबूत पहिए देखकर आपको लगता आ रहा होगा कि ये पहिए लोहे धातु के होते हैं, लेकिन यह गलत है। आइए विस्तार से जानते हैं...

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जी हां, ट्रेन के पहिए लोहे के धातु के नहीं होते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि ट्रेन के पहिए मुख्य रूप से फोर्ज्ड स्टील या फिर कार्बन स्टील मिक्स धातु से बनते हैं। ट्रेन के पहिए बहुत ही मजबूत, उच्च दबाव और भारी वजन को सहने के लिए बनाए जाते हैं। इन्हें बनाने के लिए भारी स्टील को उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। इन पहिओं को फोर्जिंग प्रोसेस से बनाया जाता है।

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भारत में 16 अप्रैल 1853 को ट्रेन की शुरुआत हुई थी। उस समय 13 डिब्बों के ट्रेन को चलाने के लिए 3 इंजन लगते थे। तीनों इंजन के नाम साहिब, सिंध और सुल्तान थे। पहली ट्रेन दोपहर करीब 3 बजकर 30 मिनट पर बोरीबंदर से चलाई गई थी। 1 घंटा 15 मिनट में कुल 34 किमी का सफर तक कर ट्रेन ठाणे पहुंची थी। पहली यात्रा में करीब 400 लोगों ने सफर किया था।

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आपको जानकर गर्व होगा कि भारतीय रेल की शुरुआत साल 1853 में हुई थी। आज भारतीय रेल नेटवर्क दुनिया का चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क बन चुका है। इसके अलावा आज वंदे भारत, तेजस एक्सप्रेस, राजधानी एक्सप्रेस, शताब्दी एक्सप्रेस, दुरंतो एक्सप्रेस जैसी प्रीमियम ट्रेन भारतीय रेलवे की शान बनीं हुई हैं।

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बता दें कि साल 2024 के आंकड़ों के अनुसार भारत में 68,584 किलोमीटर से अधिक के मार्ग पर 13,000 से अधिक यात्री ट्रेनें चलती हैं। इसमें आधुनिक वंदे भारत, राजधानी, शताब्दी और भारत गौरव जैसी पर्यटक ट्रेनें हैं। अब 99% से अधिक का विद्युतीकरण हो चुका है। सामान्य यात्रा के अलावा भारतीय रेलवे गौरव पर्यटक ट्रेनें भी चलाता है। ये ट्रेनें सांस्कृतिक और तीर्थ स्थलों को कवर करती हैं।