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गुजरात के कच्छ रेगिस्तानी इलाके में हाल ही में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के एक नन्हे चूजे ने जन्म लिया. राज्य में एक दशक के बाद ऐसी गुड न्यूज मिली है, क्योंकि ग्रेड इंडियन बस्टर्ड पक्षी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस चूजे को 800 किलोमीटर लंबी सड़क यात्रा के बाद लाया गया था और अब इसकी सुरक्षा में 50 वन्यजीव अधिकारियों की टीम 24 घंटे तैनात हैं.
मां पक्षी पर कड़ी नजर

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50 अधिकारियों की टीम मां पक्षी की हर गतिविधि पर पैनी नजर रख रही है, ताकि चूजे और मां दोनों सुरक्षित रहें. रात-दिन ट्रैकिंग से भटकने वाले कुत्तों या अन्य खतरे से बचाव सुनिश्चित हो रहा है. यह प्रयास प्रजाति के अस्तित्व के लिए निर्णायक साबित हो सकता है.
घटती संख्या एक बड़ा संकट

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जंगलों में मात्र 150 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड बचे हैं, जो पिछले 25 वर्षों में तेजी से लुप्त हो रही हैं. जंगली कुत्ते, सिकुड़ता आवास और बिजली तारों से होने वाली मौत ने इनकी संख्या को गंभीर संकट में डाल दिया है. आईयूसीएन रेड लिस्ट में इसे 'क्रिटिकली एंडेंजर्ड' घोषित किया गया है.
बिजली तारों का घातक खतरा

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इन पक्षियों के रेगिस्तानी घर में विशाल सौर ऊर्जा परियोजनाएं विकसित हो रही हैं, जिनके ऊपरी बिजली तार बार-बार घातक साबित हो रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने प्रजनन क्षेत्रों में इन्हें भूमिगत करने का आदेश दिया था. सरकार ने नवीकरणीय ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं का हवाला देकर इसे चुनौती दी.
कच्छ की संकटपूर्ण स्थिति

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कच्छ में स्थानीय आबादी में केवल तीन मादा पक्षी बची थीं, बिना किसी नर के प्राकृतिक प्रजनन असंभव था. पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसे 'जंपस्टार्ट अप्रोच' बताया, जिसमें बाहरी कार्यक्रम से अंडा लाकर नई जान फूंकी गई. यह कदम क्षेत्रीय संरक्षण को नई दिशा दे सकता है.
स्थानीय सहयोग की अपील

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अधिकारियों ने आसपास के ग्रामीणों से पशुओं को क्षेत्र से दूर रखने की अपील की है. मवेशियों से उत्पन्न खतरे को कम करने के लिए विशेष निर्देश जारी किए गए हैं. समुदाय का सहयोग इस चूजे के भविष्य को मजबूत बनाएगा.
मील का पत्थर साबित होगा संरक्षण

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यह चूजा गुजरात में दस साल बाद फूटा पहला ग्रेट इंडियन बस्टर्ड है, जो राष्ट्रीय संरक्षण प्रयासों की सफलता का प्रतीक है. पूरे तंत्र की ताकत इस नन्हे जीव के पीछे लगी हुई है. आने वाले समय में इससे प्रजाति पुनरुद्धार की उम्मीदें बलवती होंगी.