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महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया है. अजीत पवार के दुखद निधन के बाद, अब उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार डिप्टी सीएम के रूप में प्रदेश की कमान संभालने जा रही हैं. वह राज्य के इतिहास में पहली महिला उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगी. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर जब राज्य में मुख्यमंत्री है, तो डिप्टी सीएम की क्यों जरूरत पड़ती है? आइए जानते हैं कितनी ताकत होती है इस पद पर बैठने वालों के पास?

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भारतीय संविधान में 'उपमुख्यमंत्री' शब्द का स्पष्ट जिक्र कहीं नहीं मिलता. लेकिन आर्टिकल 163 और 164 के अनुसार, राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं और उनकी सलाह पर कैबिनेट मंत्रियों को चुना जाता है. डिप्टी सीएम का पद राजनीतिक संतुलन के लिए बनाया जाता है.

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भले ही यह पद संवैधानिक न हो, लेकिन डिप्टी सीएम की शक्तियां बहुत महत्वपूर्ण होती हैं. उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलता है. वे अपने आवंटित विभागों के स्वतंत्र फैसले ले सकते हैं और सरकार के हर निर्णयों में उनकी राय काफी मायने रखती है.

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अब सवाल उठता है कि उपमुख्यमंत्री को कितना वेतन मिलता है? बता दें कि उनको वही वेतन, भत्ते और सरकारी सुविधाएं दी जाती हैं जो एक कैबिनेट मंत्री को मिलती हैं. इसमें सरकारी बंगला, सुरक्षा दस्ता, और आधिकारिक वाहन जैसी तमाम सुविधाएं दी जाती हैं.

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हालांकि, यह पहली बाकर नहीं जब कोई उपमुख्यमंत्री बन रहा हो, भारत में उपमुख्यमंत्री बनाने की परंपरा काफी पुरानी है. बिहार के दिग्गज नेता अनुग्रह नारायण सिंह देश के पहले डिप्टी सीएम थे. 1967 के बाद, जब राज्यों में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, तब इस पद का चलन काफी बढ़ गया, तब से लेकर आज भी यह पद हमेशा चर्चा में रहता है.

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अब सवाल उठता है कि आखिर इस पद की क्या जरूरत है? बता दें कि अक्सर गठबंधन सरकारों में सत्ता की साझेदारी और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के लिए डिप्टी सीएम नियुक्त किए जाते हैं. यह पद पार्टी के अंदर बड़े नेताओं की अहमियत बनाए रखने और वोट बैंक को एकजुट रखने में प्रभावी होते हैं.