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अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी यानी ईपीए ने पहली बार माइक्रोप्लास्टिक और दवाओं के अवशेषों को पीने के पानी के लिए बड़ा खतरा घोषित किया है. इस फैसले के बाद अब सरकार इन प्रदूषकों की जांच करने, उन पर नजर रखने और भविष्य में इनके लिए राष्ट्रीय सीमा तय करने की तैयारी में है.
शरीर पर क्या असर?

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रिसर्च में इंसानी खून और अंगों में प्लास्टिक के नन्हे कण पाए गए हैं जो भोजन या हवा के जरिए हमारे शरीर के भीतर तक पहुंच जाते हैं. वैज्ञानिकों ने फेफड़ों और लिवर के साथ-साथ दिमाग के सैम्पल्स में भी इनकी भारी मौजूदगी दर्ज की है जो भूलने की बीमारी का कारण बन सकते हैं.
पानी में दवाएं कैसे?

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इंसानी कचरे और दवाओं को फेंकने की वजह से इनके अवशेष नदियों और जलाशयों तक पहुंच जाते हैं जो वाटर ट्रीटमेंट के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं होते. ईपीए ने अब करीब 374 अलग-अलग दवाओं के लिए हेल्थ मानक जारी किए हैं ताकि यह पता चल सके कि पानी में इनकी कितनी मात्रा जोखिम भरी है.
क्या है बड़ी चुनौती?

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माइक्रोप्लास्टिक को पानी से अलग करना बहुत मुश्किल काम है क्योंकि इनके कण इतने छोटे होते हैं कि वे आम फिल्टर से आसानी से निकल जाते हैं. वैज्ञानिक अब ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम कर रहे हैं जिससे इन नन्हे प्लास्टिक कणों की सटीक माप की जा सके और इन्हें शरीर से दूर रखा जा सके.
दिल के लिए खतरा?

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एक स्टडी में धमनी की सर्जरी के दौरान मिले कचरे में आधे से ज्यादा मरीजों के शरीर में प्लास्टिक के कण पाए गए हैं. जिन मरीजों के शरीर में ये कण मौजूद थे उनमें हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा उन लोगों के मुकाबले कहीं ज्यादा देखा गया है जिनके शरीर में ये कण नहीं थे.
आगे की राह क्या?

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सरकार अब अगले कुछ महीनों में पानी की टेस्टिंग के नए नियम बनाएगी ताकि जनता को साफ और सुरक्षित पानी मिल सके. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल टेस्टिंग से काम नहीं चलेगा बल्कि प्लास्टिक प्रदूषण को जड़ से रोकना ही इस समस्या का सबसे बड़ा और इकलौता समाधान है.