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Opinion

योगी को 2027 से पहले ‘चक्रव्यूह’ में फंसाने की साजिश, मास्टर माइंड कौन?

सियासी पंडितों को लगने लगा है कि यूपी में सीएम योगी के खिलाफ भी एक चक्रव्यूह रचा जा रहा है. हर दिन एक नया व्यूह रचा जाता है, जिससे योगी किसी तरह पार पाते हैं, तब तक दूसरा रच दिया जाता है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि इस चक्रव्यूह का आठवां और अंतिम व्यूह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कभी भी आ सकता है. पढ़िए लेखक राजशेखर त्रिपाठी के विचार.

Author Edited By : Palak Saxena
Updated: Jan 14, 2026 18:41

राजशेखर त्रिपाठी

जिस साल इंदिरा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या हुई, उसी साल अमिताभ बच्चन की एक फिल्म आयी ‘इंकिलाब’. अमिताभ ने फिल्म में मवाली किस्म के टिकट ब्लैकिये का किरदार किया था, जो एक नेता की मेहरबानी से पहले पुलिस वाला बनता है, फिर एमएलए बन जाता है. मामला यहीं नहीं रुकता,घाघ पॉलिटीशियन उसे मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी में लग जाते हैं. यही नहीं ये बूढ़े उसका हर फैसला खुद करते हैं, यहां तक कि उसकी कैबिनेट में कौन होगा और उसका विभाग क्या होगा ? फिल्म का क्लाइमेक्स क्या है ये आप खुद देखिए. मगर क्लाइमेक्स से ठीक पहले एक गाना आता है ‘अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस गया है तू’. अमिताभ को लगने लगता है कि सड़क से उठा कर उन्हें सियासत के चक्रव्यूह में फंसा दिया गया.

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बहरहाल अब सिल्वर स्क्रीन के इंद्रजाल से निकल कर ‘रीयल पॉलिटीक’ की ओर चलते हैं. सियासी पंडितों को लगने लगा है कि यूपी में सीएम योगी के खिलाफ भी एक चक्रव्यूह रचा जा रहा है. हर दिन एक नया व्यूह रचा जाता है, जिससे योगी किसी तरह पार पाते हैं, तब तक दूसरा रच दिया जाता है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि इस चक्रव्यूह का आठवां और अंतिम व्यूह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कभी भी आ सकता है.

अब ताज़ा मामला सूबे में SIR का है, जिसमें लगभग तीन करोड़ वोटरों के नाम कट गए. बताया जा रहा है कि इनमें बड़ी तादाद बीजेपी के ही वोटरों की है. होना तो ये चाहिए था कि इसके लिए संगठन में बैठे लोगों की लानत-मलामत होती, मगर ठीकरा फूटता दिखा योगी सरकार के सिर. बताया जा रहा है कि सेंटर ने भी दिल्ली आए योगी से ही जवाब तलब किया. लखनऊ लौट कर योगी ने एक मीटिंग बुलाई – मीटिंग में बहुत से मंत्री, विधायक और नेता वर्चुअली भी जुड़े. अब कितना सही कितना ग़लत लेकिन बताया जाता है कि जब योगी इसके लिए नेताओं और कार्यकर्ताओं से सवाल कर रहे थे, तो ब्रजमण्डल के एक ब्राह्मण मंत्री ने पलट कर योगी पर ही उंगली उठा दी कि – ग़लती किसकी है ? उसका कहना था कि बीएलओ तो आपकी सरकार के ही हैं. कोई और दिन होता तो योगी से इस तरह बात करने का हिम्मत बड़ी बात होती. मगर कहते हैं कि योगी इस बार खामोश रह गए. फिलहाल अभी तो आनन-फानन में ड्राफ्ट लिस्ट सुधारना और जिनका नाम कटा उन्हें जोड़ना प्राथमिकता है.

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इस बीच एक नया घटनाक्रम देखने को मिला. ब्राम्हणों की कथित बैठक से जो विधायक नदारद रहे, या जाकर भी खुद को बाद में दूर कर लिया, वो पूर्वांचल गए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी का स्वागत करते नजर आए. चौधरी ने ऐसी बैठकों को अनुशासन हीनता बता कर चेतावनी दी थी, तो सूबे के ब्राह्मणों की तोप उनकी ओर ही घूम गयी थी. योगी उस दौरान दिल्ली में थे, तो विधायक शलभ मणि त्रिपाठी चौधरी का स्वागत करने देवरिया से चल कर गोरखपुर आए. चिल्लूपार के विधायक राजेश त्रिपाठी ने जनता से चौधरी का भव्य स्वागत करने की अपील की. यही नहीं वहां नारे लगे पंकज चौधरी-राजेश त्रिपाठी जिंदाबाद जिंदाबाद.

अब तीसरा और गंभीर मामला बजरंग दल वाले विनय कटियार का है. कटियार ने अचानक बग़ावत का झंडा बुलंद कर दिया है. फैजाबाद से तीन बार सांसद और दो बार राज्यसभा सदस्य रहे चौधरी का कहना है कि वो 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. पत्रकारों ने पूछा कहां से तो कटियार ने साफ कहा अयोध्या से बेहतर सीट उनके लिए क्या होगी. मंदिर आंदोलन ने ही कटियार को जीरो से हीरो बनया, बजरंग दल का संस्थापक अध्यक्ष बनाया – और राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में उन्हें पूछा तक नहीं गया !

ये सबको पता है कि प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम की ‘गेस्ट लिस्ट’ दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय से फ़ाइनल हुई थी. तो कटियार की बौखलाहट केंद्र के खिलाफ होनी चाहिए, मगर कटियार विधानसभा लड़ने का ऐलान कर मुसीबत योगी की बढ़ा रहे हैं.

कटियार कुर्मी जाति से आते हैं और कुर्मियों की इस वक़्त बीजेपी में पूछ बढ़ी है. मगर कटियार का दुर्भाग्य ये है कि अपने दौर का इतना बड़ा नेता होने के बावजूद उनकी पूछ घट गयी है. मंदिर आंदोलन में वो दूसरी कतार के नेता थे, जबकि मोदी जी की पहचान गुजरात तक सिमटी हुई थी. आडवाणी की रथ यात्रा का श्रेय भी प्रमोद महाजन को दिया जाता है. 6 दिसंबर को हाल ये था कि कटियार की हॉट लाइन लखनऊ में कल्याण सिंह और दिल्ली में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव दोनों से जुड़ी थी. दोनों उन्हीं से अपडेट ले रहे थे.

अब जो उन्होंने अयोध्या से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है तो इसे उनकी उपेक्षा से उबरने की कोशिश माना जा रहा है. हालांकि बीजेपी में ये तरीक़ा चलता नहीं, और इसे कटियार भी खूब समझते होंगे. बावजूद इसके अगर वो बाग़ी तेवर अख्त़ियार कर रहे हैं तो इसका नतीजा क्या होगा ? अगर वो निर्दलीय लड़ गए तो नुकसान किसका होगा ? कटियार किसी तरह का नुकसान पहुंचाने की स्थिति में हैं भी या नहीं ?

अब यूपी में कटियार के ऐलान के बाद जो नैरेटिव खड़ा हुआ हुआ है इसे भी समझिए. कहा जा रहा कि विनय कटियार ने ये तेवर दिल्ली के इशारे पर ही अख्त़ियार किया है. जाहिर है ये दिल्ली बनाम लखनऊ की वही कहानी है जो बार-बार उभर कर सामने आ जाती है. कटियार ने बयान नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी से मुलाकात के बाद दिया, इसलिए ये धारणा और बलवती हो जाती है. दरअसल 2027 की लड़ाई पूरी तरह सीएम योगी की है. जीते तो लखनऊ से आगे खुला मैदान और पिछड़े तो वाटरलू की जंग. मुश्किल ये है कि कटियार जैसे किरदार अभी और सामने आएंगे, इंतजार करिए योगी कैबिनेट के विस्तार का.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News24 उत्तरदायी नहीं है.)

First published on: Jan 14, 2026 06:31 PM

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