Why Does India Still Follow the 33% Pass Mark: कई पीढ़ियों से भारतीय छात्र ये जानते हुए बड़े हुए हैं कि एग्जाम पास करने के लिए 33% स्कोर करना काफी है. हालांकि ये फिगर एक जाना-पहचाना बेंचमार्क बन गया है, लेकिन इसकी शुरुआत किसी मॉडर्न एजुकेशनल फिलॉसफी के बजाय ब्रिटिश कॉलोनियल एजुकेशन सिस्टम से हुई है, यानी इस नियम को आजादी से पहले से फॉलो किया जा रहा है.
कब शुरू हुआ ये सिस्टम?
ब्रिटिश राज के दौरान, कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास की यूनिवर्सिटीज ने क्लर्क और एडमिनिस्ट्रेटिव नौकरियों के लिए सही कैंडिडेट की पहचान करने के लिए एग्जाम के तरीके अपनाए. फोकस इनोवेशन या एडवांस्ड लर्निंग को बढ़ावा देने पर नहीं था, बल्कि बेसिक लेवल की लिटरेसी और न्यूमरेसी एनश्योर करने पर था. वक्त के साथ, कुल मार्क्स का एक-तिहाई धीरे-धीरे एग्जाम पास करने के लिए माना जाने वाला मिनिमम स्टैंडर्ड बन गया.
33% स्कोर ही क्यों?
दिलचस्प बात ये है कि हिस्टोरियंस को कोई ऐसा ऑफिशियल ब्रिटिश डॉक्यूमेंट नहीं मिला है जो ये बताए कि क्वालिफाइंग मार्क 33% ही क्यों तय किया गया था. इसके बजाय, एक्सपर्ट्स का मानना है कि बेंचमार्क धीरे-धीरे एक प्रैक्टिकल एडमिनिस्ट्रेटिव स्टैंडर्ड के तौर पर डेवलप हुआ. एक पॉपुलर दावा कि ब्रिटिश हमारे देश के लोगों को अंग्रेजों से ‘हाफ इंटेलिजेंट’ मानते थे और इसलिए कम पास मार्क तय करते थे, इस बात को हिस्टोरिकल सबूतों से कभी सपोर्ट नहीं मिला.
1947 के बाद भी जारी रहा दस्तूर
आजादी के बाद भारत ने कॉलोनियल एग्जाम स्ट्रक्चर को काफी हद तक बनाए रखा. हालांकि टेक्स्टबुक्स, करिकुलम और सरकारें बदल गईं, लेकिन कई एजुकेशनल बोर्ड और यूनिवर्सिटीज में मिनिमम पास परसेंटेज काफी हद तक वैसा ही रहा, जो अब तक चला आ रहा है.
पक्ष और विपक्ष में तर्क
इस पुराने सिस्टम को सपोर्ट करने वाले लोग अक्सर कहते हैं कि 33% पास मार्क स्टूडेंट्स को कुछ गलतियों की वजह से एकेडमिक साल बर्बाद होने से बचाता है, खासकर तब जब ग्रेस मार्क्स बॉर्डरलाइन कैंडिडेट्स को क्वालिफाई करने में मदद करते हैं. हालांकि, क्रिटिक्स का मानना है कि ये सिस्टम स्टूडेंट्स को सब्जेक्ट्स में बेहतर नॉलेज हासिल करने के बजाय सिर्फ एग्जाम पास करने के लिए पढ़ाई करने के लिए बढ़ावा देता है. वो ये भी कहते हैं कि सीखने में कमी का इफेक्ट अक्सर हायर एजुकेशन, कॉम्पिटिटिव एग्जाम या नौकरी के दौरान बाद में दिखाई देती है.
क्या है दूसरे देशों का हाल?
इंग्लैंड समेत कई देश जो पहले ऐसे ही सिस्टम फॉलो करते थे, अब ग्रेड-बेस्ड या स्टैंडर्ड-बेस्ड असेसमेंट पर शिफ्ट हो गए हैं. यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, नेपाल और श्रीलंका अब फिक्स्ड पास परसेंटेज पर डिपेंड नहीं करते, जबकि पाकिस्तान ने अपने मिनिमम क्वालिफाइंग मार्क को बढ़ाकर 40% करना शुरू कर दिया है. इन ग्लोबल चेंजेज के बावजूद, भारत कई स्कूल बोर्ड और यूनिवर्सिटी में ट्रेडिशनल 33% बेंचमार्क को फॉलो करना जारी रखे हुए है, जो ये बताता है कि हमारा देश का सिस्टम अभी भी ब्रिटिश काल के बने तरीकों पर चल रहा है.