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‘महिला का नाड़ा खोलना रेप की कोशिश, महज अश्लील हरकत नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा HC का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया है, जिसमें महिला की सलवार का नाड़ा खोलने को केवल 'अश्लील हरकत' माना गया था. हाईकोर्ट के इस फैसले पर एनजीओ 'वी द वुमन' की संस्थापक शोभा गुप्ता के पत्र के बाद सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया.

Author Edited By : Vijay Jain
Updated: Feb 18, 2026 09:07
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा HC का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 में दिए उस विवादास्पद फैसले को पलट दिया, जिसमें आरोपी के कृत्य को कम गंभीर माना गया था. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला के पायजामे का नाड़ा खोलना महज अश्लील हरकत या छेड़छाड़ नहीं है, बल्कि यह रेप का प्रयास माना जाएगा. हाईकोर्ट के इस फैसले पर एनजीओ ‘वी द वुमन’ की संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता के पत्र के बाद सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया. मामला उत्तर प्रदेश से जुड़ा है, जहां आरोपियों ने एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ की. आरोप था कि आरोपियों ने लड़की के पायजामे का नाड़ा तोड़ा और उसे पुलिया के नीचे घसीटने की कोशिश की. हालांकि, वहां से गुजर रहे कुछ लोगों के हस्तक्षेप से आरोपी भाग गए.

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POCSO एक्ट की धाराओें के तहत लगे थे आरोप

ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों पर आईपीसी की धारा 376 (रेप) और POCSO एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत सख्त आरोप लगाए थे, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मार्च 2025 में दिए गए फैसले में इसे रेप का प्रयास न मानते हुए तर्क दिया कि यह अपराध की तैयारी थी, जो महिला की गरिमा भंग करने या छेड़छाड़ जैसा कम गंभीर अपराध है. इस फैसले से काफी आक्रोश फैला था. सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की बेंच ने की. इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया गया.

यह है सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

CJI सूर्यकांत ने कहा कि ऐसे कृत्य को कम गंभीर अपराध मानना न्याय की भावना के खिलाफ है. पायजामा का नाड़ा खोलना और कपड़े उतारने की कोशिश सीधे रेप के प्रयास के बराबर है. कोई भी जज या अदालत तब तक पूर्ण न्याय नहीं कर सकती, जब तक वह मुकदमे के तथ्यों की वास्तविकता और पीड़िता की कमजोरियों के प्रति विचारशील न हो. न्यायाधीशों के फैसले में सिर्फ कानूनी सिद्धांत ही नहीं, बल्कि करुणा और सहानुभूति भी होनी चाहिए. इनके अभाव में न्यायिक संस्थान अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभा पाएंगे.

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया. आरोपियों के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत रेप के प्रयास के मूल और सख्त आरोप बहाल कर दिए गए. सुप्रीम कोर्ट ने केवल फैसला ही नहीं सुनाया, बल्कि भविष्य के लिए एक बड़ा कदम भी उठाया है। कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक और पूर्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस से विशेषज्ञ समिति गठित करने को कहा है. यह समिति यौन अपराधों और संवेदनशील मामलों में जजों के लिए संवेदनशीलता और करुणा विकसित करने के सरल भाषा वाले दिशा-निर्देश तैयार करेगी.

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First published on: Feb 18, 2026 09:07 AM

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