तलाक के बाद पत्नी ही नहीं पति को भी मिलता है भरण-पोषण, जरूरी है ये शर्तें
Edited By Rakesh Choudhary

Husband Claim Maintenance From Wife After Divorce
Edited By Rakesh Choudhary

Husband Claim Maintenance From Wife After Divorce
Husband Claim Maintenance From Wife After Divorce: भरण-पोषण से संबंधित भारतीय कानून हमेशा पत्नी के पक्ष में झुके रहे हैं, कम से कम समाज में तो यही आम धारणा है। हर कोई जानता है कि पत्नी को गुजारा भत्ता देना भारतीय समाज में एक आम अवधारणा है। हम सभी जानते हैं कि भारतीय कानून समानता के सिद्वान्त पर आधारित है। पति और पत्नी दोनों कानून के अनुसार भरण-पोषण का दावा करने के हकदार हैं, लेकिन पति के भरण-पोषण का दावा करने के अधिकार पर कुछ शर्तें हैं। पति को अपनी पत्नी से भरण-पोषण का दावा करने के अधिकार का प्रावधान हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत प्रदान किया गया है।
अधिवक्ता अनंत मलिक के अनुसार हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 पति को पेंडेंट लाइट के भरण-पोषण और कार्यवाही के खर्च का प्रावधान करती है और धारा 25 पति को स्थायी गुजारा भत्ता और भरण-पोषण पाने का अधिकार प्रदान करती है। धारा 24 के तहत, एक योग्य व्यक्ति जिसके पास अपने जीवन यापन के लिए पर्याप्त आय नहीं है वह अपनी पत्नी से भरण-पोषण का दावा कर सकता है। धारा 25 पति को स्थायी गुजारा भत्ता और भरण-पोषण की अनुमति देती है। यह पत्नी को पत्नी की आय और संपत्ति को ध्यान में रखते हुए पति के जीवनकाल के लिए मासिक राशि का भुगतान करने के लिए बाध्य करता है।
मलिक ने बताया कि परिस्थितियों में बदलाव होने पर अदालत आदेश को संशोधित कर सकती है। उदाहरण के लिए, आपसी सहमति से तलाक के मामले में। यदि कोई पक्ष भरण-पोषण का दावा नहीं करने पर सहमत होते हैं तो अदालत मामले की परिस्थितियों और तथ्यों के अनुसार भरण-पोषण दे सकती है। किसी भी कार्यवाही में, यदि अदालत को यह प्रतीत होता है कि पति या पत्नी के पास अपने समर्थन और कार्यवाही के आवश्यक खर्चों के लिए कोई स्वतंत्र आय स्रोत नहीं है तो अदालत आवेदन पर ऐसा कर सकती है।
इस प्रकार इस धारा के तहत एक योग्य पति जिसके पास अपने खर्चों के लिए पर्याप्त आय नहीं है, वह अपनी पत्नी से ऐसे खर्चों के लिए दावा कर सकता है यदि वह ऐसा कर सकती है। लेकिन, दूसरी ओर यदि पति के पास पर्याप्त आय और कमाने की क्षमता है तो वह इस प्रावधान के तहत दावा नहीं कर सकता है। मलिक ने कहा कि पति के भरण पोषण को लेकर दावे उचित होने चाहिए और उनके जीवन की आवश्यकताओं के मानक से मेल खाने चाहिए। यदि यह पाया जाता है कि पति के दावे और ज़रूरतें उचित नहीं हैं तो अदालत ऐसे दावों पर विचार नहीं करेगी।
पति द्वारा भरण-पोषण के अपने अधिकार का दावा करने के लिए कुछ शर्तें निर्धारित की गई हैं जिन्हें पूरा करना आवश्यक है। वह भरण-पोषण का दावा तभी कर सकता है जब उसे इसकी सख्त जरूरत हो और वह कमाने में असमर्थता साबित कर दे। पति को अदालत को संतुष्ट करना होगा कि वह किसी शारीरिक या मानसिक विकलांगता के कारण अपनी आजीविका नहीं कमा सकता और न ही उसका समर्थन कर सकता है और इस प्रकार वह अपनी पत्नी से भरण-पोषण पाने का हकदार है।
निव्या वीएम बनाम शिवप्रसाद एमके 2017 (2) केएलटी 803 के मामले में केरल उच्च न्यायालय ने माना था कि यदि पति को काम करने में असमर्थता के अभाव में भरण-पोषण प्रदान किया जाता है तो यह आलस्य को बढ़ावा देगा। पति को यह साबित करना होगा कि वह काम करने और कमाने में स्थायी रूप से अक्षम है तभी वह भरण-पोषण का दावा कर सकता है।
कई कानून पत्नी को भरण-पोषण का प्रावधान प्रदान करते हैं। ये कानून हैं आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 तलाक अधिनियम 1869, विशेष विवाह अधिनियम 1954, तलाक पर मुस्लिम महिला संरक्षण अधिनियम 1986, तलाक पर महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम 1986, घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम 1956। लेकिन केवल एक ही कानून है जो पति को भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार देता है।
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