देश का पहला वो शहर जहां पहुंचा था नलों से पानी, 140 साल पहले हुआ था ये काम

आज के समय में हर घर में नल से पानी पहुंच रहा है. ज्यादातर लोगों को आज कुंए या तालाब जाकर पानी भरने की जरूरत नहीं पड़ती है. लेकिन क्या किसी ने सोचा है कि देश का वो पहला शहर कौन सा था जहां सबसे पहले नलों से पानी पहुंचाया गया? इस शहर में पानी करीब 140 साल पहले ही नलों से आने लगा था जिसके चलते यहां के लोगों को कहीं भी दूर जाकर पानी लाने की जरूरत नहीं पड़ती थी.

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आज के समय में हर घर में नल से पानी पहुंच रहा है. ज्यादातर लोगों को आज कुंए या तालाब जाकर पानी भरने की जरूरत नहीं पड़ती है. लेकिन क्या किसी ने सोचा है कि देश का वो पहला शहर कौन सा था जहां सबसे पहले नलों से पानी पहुंचाया गया? इस शहर में पानी करीब 140 साल पहले ही नलों से आने लगा था जिसके चलते यहां के लोगों को कहीं भी दूर जाकर पानी लाने की जरूरत नहीं पड़ती थी.

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दरअसल, हम महाराष्ट्र के पुणे शहर की बात कर रहे हैं. पुणे शहर के लोग आज भी गर्व से ये बात कहते हैं कि उनके शहर में सबसे पहले पाइपलाइन और नलों के माध्यम से लोगों के घरों तक पानी पहुंचाया गया. हालांकि उस समय ऐसा होना एक चमत्कार जैसा था. लेकिन सोचने वाली बात ये है कि आखिर पुणे को ही नलों का संजाल बनाने के लिए पहले शहर के रूप में क्यों चुना गया. इस खबर में हम आज इसी के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं.

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140 साल पहले पहुंचा नलों से पानी

पुणे में आज से 140 साल पहले नलों से लोगों के घरों में पानी पहुंच गया था. 19वीं सदी में ये एक क्रांतिकारी बदलाव था. ब्रिटिश राज के लोगों ने पुणे शहर में नलों से पानी पहुंचाया.

बता दें कि अंग्रेजों के आने से पहले पुणे शहर में आमतौर पर लोग कुए, तालाबों या फिर बावड़ियों से अपने लिए पानी का इंतजाम करते थे, लेकिन बारिश के समय यह पानी दूषित और गंदा हो जाता है जिसके कारण लोगों को हैजा, टायफॉइड और डायरिया जैसी बीमारियों होती थीं.

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वहीं, 1817 में जब पुणे पर ब्रिटिशों का अधिकार हुआ और कैंटोनमेंट बना, तो यह समस्या उनके लिए और भी ज्यादा गंभीर हो गई. गंदे पानी के कारण हजारों सैनिक और अधिकारियों के घरों के लोग बीमार पड़ने लगे और उनके लिए कुए या फिर तालाबों पर निर्भर रहना बेहद मुश्किल था.

कैंटोनमेंट में पानी पहुंचाना था मुश्किल

19वीं सदी में पुणे शिक्षा, प्रशासन और सैन्य गतिविधियों का एक बड़ा और मुख्य केंद्र बन चुका था. यहां भारत के एलीट वर्ग के लोग और ब्रिटिश अफसर दोनों रहते थे. जिसके बाद अब इनके सामने संकट था साफ पानी.

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इनके लिए ये एक बड़ा चैलेंज था कि आखिर कैंटोनमेंट एरिया में साफ पानी कैसे पहुंचाया जाए. इसके बाद अंग्रेज ये सोचने लगे कि क्या पाइपलाइन के जरिए घरों तक साफ पानी पहुंचाया जा सकता है? क्योंकि अंग्रेज ये काम पहले भी इंग्लैंड में कर चुके थे. जिसके बाद ब्रिटिश इंजीनियरों ने 1870 में ये योजना बनाई कि कैसे पानी पुणे कैंटोनमेंट तक पाइपलाइन के जरिए पहुंचाया जाए. इसके पहले चरण में एक बांध बनाना था जहां पर साफ पानी को स्टोर किया जा सके और फिर पाइपलाइन के सहारें लोगों के घरों तक पानी पहुंचाया जा सके.

मुठा नदी पर शुरू हुआ था बांध का काम

मिली जानकारी के अनुसार, 1873 में मुठा नदी पर बांध का काम शुरू किया गया. 1879 तक खड़कवासला डैम तैयार कर लिया गया था. इस बांध को बनाने में ब्रिटिश आर्मी को करीब 6 साल का समय लगा था और इसे बनाने में करीब 50 लाख रुपये लगे थे. यह बांध बनाने वाले इंजीनियरों के लिए उस समय एक अजूबा जैसा था. पत्थर और चूना से बनी एक बड़ी दीवार ने पानी को रोकने का काम किया.

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बांध बनने के बाद शुरू हुई चुनौती

बांध बन कर तैयार हो चुका था, लेकिन अब चुनौती थी कि पानी को वहां से 20 किलोमीटर दूर पुणे शहर तक कैसे पहुंचाया जाए. इस दौरान यह जटिल काम इंजीनियर कर्नल आर.एस. कैपल और जे.एच.सी. फिंडक्ले को दिया गया था.

बता दें कि यह परियोजना भारत में पहली बार ग्रेविटी बेस्ट पाइपलाइन सिस्टम का उदाहरण बनी थी. यानी ऊंचाई से नीचे की ओर पानी अपने दबाव से बहकर घरों तक पहुंचता था. उस समय भारत में इतनी मजबूत पाइप नहीं बनता था. इसलिए लंदन से भारी लोहे की पाइपें मंगवाई गईं. इन्हें समुद्र के रास्ते बंबई (मुंबई) और वहां से बैलगाड़ियों के जरिये पुणे तक लाया गया.

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1880 में पूरा हुआ था पाइपलाइन बिछाने का काम

सबसे मुश्किल काम था पूरे शहर में पाइप बिछाना. खड़कवासला से पुणे तक का इलाका बेहद खराब और ऊबड़ खाबड़ था और इसीलिए वहां पाइप बिछाना आसान नहीं था. पाइप बिछाने के लिए कई जगहों पर चट्टानें काटनी पड़ी, जो मजदूर काम पर लगाए गए उन्हें गर्मी और कई बीमारियों ने घेर लिया, जिसके कारण उन्हें कई दिक्कतें हुईं. लेकिन इतनी चुनौतियों के बाद भी इंजीनियरों और मजदूरों ने मिलकर 1880 के दशक की शुरुआत में यह काम पूरा कर लिया था.

पूरे शहर में जब पाइपलाइन बिछ गई और पहली बार पानी पाइप के जरिए लोगों के घरों तक पहुंचा तो शहर में उत्साह का माहौल था.

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दूसरे शहरों में अपनाया गया यही प्रोसेस

पुणे में सफलता हासिल करने के बाद यहीं प्रोजेक्ट दूसरे शहरों तक भी ले जाया गया. मुंबई, मद्रास और कलकत्ता में भी इसी तरह की परियोजनाएं शुरू हुईं, वहां भी नलों के जरिए पानी पहुंचाया गया था.

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लेखक के बारे में

Versha Singh

Versha Singh

वर्षा स‍िंह News 24 ड‍िजिटल में बतौर सीन‍ियर सब एड‍िटर के पद पर कार्यरत हैं. वर्षा को ड‍िजिटल मीड‍िया में 6 साल से अधि‍क का अनुभव है. राष्‍ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और समसमाय‍िक व‍िषयों पर वर्षा की अच्‍छी पकड़ है. इसके अलावा राजनीत‍िक, क्राइम और ट्रेंडिंग खबरें भी ल‍िखती हैं. वर्षा ने मास्टर इन न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी की पढ़ाई माखन लाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी, भोपाल से की है और जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की है. वर्षा अपने करियर में Jagran New Media, Asia News International (ANI) और ETV Bharat जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं. उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन और समसामयिक घटनाओं, राजनीति, हाइपरलोकल खबरों और मानवीय रुचि से जुड़ी कहानियों को डिजिटल दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अनुभव है.
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