देश के महत्वपूर्ण और रणनीतिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को तकनीकी रूप से और ज्यादा मजबूत बनाने के लिए केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) ने IIT कानपुर के साथ दो महत्वपूर्ण समझौते किए हैं. इनका मकसद आधुनिक और तकनीक आधारित सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए CISF की क्षमताओं को और विकसित करना है. इन दोनों समझौतों के तहत एक ओर CISF कर्मियों को साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में एडवांस ट्रेनिंग दी जाएगी, वहीं दूसरी ओर राजस्थान के बहरोड़ में मौजूद CISF ट्रेनिंग सेंटर में ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक के लिए अत्याधुनिक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किया जाएगा.
C3iHub के साथ साइबर सुरक्षा में एडवांस ट्रेनिंग
पहले समझौते के तहत IIT कानपुर के C3iHub के सहयोग से CISF जवानों को साइबर सुरक्षा की एडवांस ट्रेनिंग दी जाएगी. ये पहल 2024 में आयोजित DGP/IGP सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी के विजन और अर्धसैनिक बलों में विशेष साइबर कमांडो तैयार करने की दिशा में उठाए गए कदमों से जुड़ी है. CISF देश के कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रतिष्ठानों की सुरक्षा में तैनात है. ऐसे में इन प्रतिष्ठानों को संभावित साइबर हमलों से सुरक्षित रखने के लिए बल की साइबर सुरक्षा क्षमता को मजबूत करना महत्वपूर्ण है. इसी मकसद से हर बैच में 40 CISF जवानों को खास ट्रेनिंग दी जाएगी.
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किन साइबर चुनौतियों पर होगी ट्रेनिंग?
इस ट्रेनिंग में आधुनिक साइबर सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया जाएगा. इनमें एविएशन, पावर और न्यूक्लियर सेक्टर पर मंडराते साइबर खतरे, क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल फोरेंसिक और इंसिडेंट रिस्पॉन्स प्रमुख हैं. इसके अलावा जवानों को AI, मशीन लर्निंग (ML), डीपफेक, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), क्लाउड जैसे आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों की भी जानकारी दी जाएगी. ट्रेनिंग के दौरान Crisis Simulation भी कराया जाएगा, ताकि CISF कर्मियों को संभावित साइबर संकट जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए व्यावहारिक रूप से तैयार किया जा सके.
ड्रोन-एंटी ड्रोन तकनीक के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस
दूसरा समझौता राजस्थान के बहरोड़ में मौजूद CISF के रिजनल ट्रेनिंग सेंटर (RTC) में ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक का अत्याधुनिक से सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने के लिए किया गया है. इसके लिए पांच साल का फ्रेमवर्क तैयार किया गया है. इस सेंटर का मुख्य उद्देश्य ड्रोन तकनीक और उससे जुड़े सुरक्षा पहलुओं पर रिसर्च, ट्रेनिंग और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना है. इसके अलावा संदिग्ध ड्रोन्स की पहचान और निगरानी के लिए Radar और Micro-Doppler Detection तकनीक पर भी काम किया जाएगा. साथ ही Counter-UAS Systems और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ड्रोन ऑपरेशंस से जुड़े विषयों पर साझा शोध किया जाएगा.
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