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‘शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना अपराध नहीं…’, इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

लिव इन रिलेशनशिप को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. हाई कोर्ट का कहना है कि शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कोई अपराध नहीं है. कोर्ट ने कहा कि सामाजिक नैतिकता नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के कोर्ट के कर्तव्य पर हावी नहीं हो सकती. कोर्ट का यह फैसला एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया है, जिसमें लिव इन में रह रहे शादीशुदा कपन ने सुरक्षा की मांग की थी.

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Edited By : Versha Singh Updated: Mar 27, 2026 22:50

लिव इन रिलेशनशिप को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. हाई कोर्ट का कहना है कि शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कोई अपराध नहीं है. कोर्ट ने कहा कि सामाजिक नैतिकता नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के कोर्ट के कर्तव्य पर हावी नहीं हो सकती. कोर्ट का यह फैसला एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया है, जिसमें लिव इन में रह रहे शादीशुदा कपन ने सुरक्षा की मांग की थी.

कानून को सामाजिक, नैतिकता से अलग रखा जाना चाहिए- कोर्ट

याचिका में कहा गया था कि कपल को महिला के परिवार से धमकियां मिल रही हैं. महिला के परिवार के वकील ने दलील दी कि चूंकि वह व्यक्ति पहले से शादीशुदा है. इसलिए किसी दूसरी महिला के साथ रहना उसके लिए एक अपराध है. हालांकि, कोर्ट ने टिप्पणी की कि कानून को सामाजिक, नैतिकता से अलग रखा जाना चाहिए. ‘ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसके तहत कोई शादीशुदा व्यक्ति, किसी वयस्क के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है. ऐसे व्यक्ति को किसी भी तरह के अपराध के लिए अभियोजित किया जा सके.’

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हाई कोर्ट ने कहा कि यदि कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता है, तो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट की कार्रवाई को सामाजिक राय और नैतिकता निर्देशित नहीं करेगी.

कपल ने मांगी थी सुरक्षा

कोर्ट ने कहा कि महिला ने एसएसपी शाहजहांपुर को पहले ही एक एप्लीकेशन दी है, जिसमें कहा गया है कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से उस आदमी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है. कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्य उनके रिश्ते के खिलाफ हैं. उन्होंने उसे जान से मारने की धमकी दी है और दोनों को ऑनर किलिंग का डर है.

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कोर्ट ने कहा कि एसएसपी ने इस शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की है. साथ रहने वाले दो वयस्कों की सुरक्षा करना पुलिस का कर्तव्य है. इस संबंध में पुलिस अधीक्षक पर विशेष दायित्व है. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ और अन्य (2018) 7 SSC 192 मामले में कहा था.

कोर्ट ने लगाई कपल की गिरफ्तारी पर रोक

कोर्ट ने कहा कि इस याचिका के साथ दोनों याचिकाकर्ताओं का संयुक्त हलफनामा भी लगा है. कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है. हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को 8 अप्रैल के लिए नोटिस जारी किया. कोर्ट ने उस जोड़े को अपहरण के एक मामले में भी सुरक्षा प्रदान की. जो महिला के परिवार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर पंजीकृत किया गया था. हाई कोर्ट के अगले आदेशों तक याचिकाकर्ताओं अनामिका और नेत्रपाल की गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई है. याचियों के खिलाफ शाह जहांपुर के जैतीपुर थाने में केस क्राइम नंबर 4/2026 में एफआईआर दर्ज है. बीएनएस, 2023 की धारा 87 के तहत एफआईआर दर्ज है.

परिवार को संपर्क और नुकसान पहुंचाने से रोका

हाई कोर्ट ने महिला के परिवार को निर्देश दिया कि वे कपल को किसी भी तरह से परेशान न करें. न तो उनसे संपर्क करें और न ही उनके घर में घुसने की कोशिश करें. किसी भी तरह की धमकी या नुकसान पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है.

कोर्ट ने साफ किया कि शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक इस कपल की सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे. यदि सुरक्षा में लापरवाही हुई, तो इसकी जवाबदेही तय की जाएगी.

First published on: Mar 27, 2026 04:54 PM

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