Tuesday, June 2, 2020

अब कोरोना से जीत पक्‍की!, 102 साल पुरानी इलाज की तकनीक से होगा इलाज, मिले बेहतर रिजल्‍ट

दुनिया के बेहद पुरानी चिकित्सा पद्धति से कोरोना को हराने की आस जगी है। 102 साल पुरानी प्लाज्मा थैरेपी के अब तक के ट्रायल बेहद शानदार रहे हैं। दुनिया भर में 5 हजार मरीजों पर जो रिसर्च हुई, उसके बाद कहा जा रहा है कि अब 'प्लाज्मा' करेगा करिश्मा।

नई दिल्‍ली: दुनिया की सबसे नई महामारी ने निपटने के लिए पूरी दुनिया दिन रात एक किए हुए है। लेकिन अब तक कहीं से कोई ऐसी खबर नहीं आई, जिससे कोरोना काल के अंत का सवेरा आ सके। अब दुनिया के बेहद पुरानी चिकित्सा पद्धति से कोरोना को हराने की आस जगी है। 102 साल पुरानी प्लाज्मा थैरेपी के अब तक के ट्रायल बेहद शानदार रहे हैं। दुनिया भर में 5 हजार मरीजों पर जो रिसर्च हुई, उसके बाद कहा जा रहा है कि अब ‘प्लाज्मा’ करेगा करिश्मा।

पूरी दुनिया पर मौत बनकर छाने वाला कोरोना से मुकाबला करने के लिए वैज्ञानिक दिन रात जुटे हैं, लेकिन एक छोटा सा वायरस पूरे विज्ञान पर भारी पड़ रहा है। इंसानी शरीर में जाने के बाद ये वायरस खुद में ऐसे बदलाव करता है कि कोई दवा कोई तकनीक उसे खोज नहीं पाती। अब इंसान कुदरत के सहारे इसी वायरस के मात देने के बहुत करीब है। वो भी किसी नई तकनीक से नहीं बल्कि इलाज के सबसे पुराने तरीके यानि प्लाजमा थैरेपी के जरिए। प्लाजमा थैरेपी को सबसे पहले स्पेनिश फ्लू से निपटने के लिए 1918 में इस्तेमाल किया गया था, तब से लेकर अब तक ये थैरेपी हमारे लिए वरदान साबित हुई है।

जब से कोरोना का अटैक दुनिया पर हुआ है तब से पूरी दुनिया में कोरोना से निपटने के लिए हर तरीका इस्तेमाल हुआ। लेकिन सबसे अच्छे रिजल्ट आए हैं प्लाजमा थैरेपी के जरिए। अमेरिका की मायो क्लीनिक, जॉन हॉफकिन्स यूनीवर्सिटी और मिशीगन स्टेट युनिवर्सिटी ने मिलकर जो रिसर्च की है उसके मुताबिक पूरी दुनिया में करीब 5 हजार मरीजों पर प्लाजमा थैरेपी का ट्रायल हुआ। ICU में दाखिल बेहद गंभीर मरीजों को प्लाजमा थैरेपी दी गई, जिसमें से 85 फीसदी मरीज रिकवर हुए। महज 1 फीसदी मरीजों में गंभीर साइड इफेक्ट दिखा। जिसके बाद यह कहा जा रहा है कि प्लाजमा थैरेपी सबसे अच्छे रिजल्ट देने वाली तकनीक बनीं।

अमेरिकी संस्था ने पूरी दुनिया में चल रही प्लाजामा थैरेपी के CASES पर नजर रखी और उनका अध्ययन किया तो बेहद अच्छे रिजल्ट मिले हैं। जो लोगो कोरोना से जंग जीतकर ठीक हो चुके थे, उनके खून से प्लाजमा लेकर ऐसे गंभीर मरीजों को दिया गया। जिनकी हालत बेहद खराब थी और इनमें से ज्यादतर तो ICU में एडमिट थे। शुरुआती तौर पर ऐसे 5 हजार मरीजों का आकंड़ा सामने आया है। इन मरीजों के शरीर में प्लाजमा के जरिए पहुंची एंटीबाडीज ने पहले अपनी सेना बनाई और फिर शरीर में मौजूद कोरोना वायरस को हराकर मरीज की जान बचा ली। इस पद्धति में सबसे खास बात ये रही कि इसमें सीवियर साइड इफेक्ट की दर महज 1 फीसदी के आसपास रही। इस दौरान 5 हजारो लोगों में से 37 लोगों की मौत भी हुई, लेकिन ये याद रखना जरुरी है कि इनमें से ज्यादातर मरीज बेहद गंभीर स्थिति वाले मरीज थे, जिनमें से 85 फीसदी की जान बच गई।

यहां ये समझना भी जरुरी है कि लोग बार-बार प्लाजमा नहीं दे सकते। इसके बीच में लंबा अंतराल होना जरुरी है। हालांकि आधिकारिक तौर पर प्लाजमा थैरेपी को कोरोना का इलाज मानने में अभी वक्त लगेगा। लेकिन FDA ने कहा कि अब तक रिजल्ट ये बताते हैं कोरोना मरीजों पर इस थैरेपी का ट्रायल किया जा सकता है और इसीलिए मार्च में अमेरिका में भी इस थैरेपी को मंजूरी मिल गई थी।

चीन के विशेषज्ञों ने भी माना है कि कोरोना से जंग में प्लाजामा थैरेपी के अच्छे रिजल्ट रहे हैं। विशेषज्ञों को मानना है कि इस थैरेपी की सफलता सबसे ज्यादा इस बात पर निर्भर करती है कि डॉक्टर से समझ पाएं कि किस मरीज को प्लाजमा दिया जाना चाहिए और किसे नहीं। डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना के इलाज में यह एक उम्मीद की किरण है। इसलिए सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि यह अस्पतालों में आसानी उपलब्ध हो और इलाज में इस तकनीक का इस्तेमाल कर सके। डॉक्टर का कहना है कि प्लाज्मा थेरेपी कोई जादू नहीं है। इसमें इलाज के प्रोटोकॉल का भी पालन किया गया। इससे मरीज में तेजी से सुधार हुआ। हालांकि सौ फीसद सुधार में थेरेपी के अलावा अन्य कारण भी रहे हैं।

खास बात ये है कि प्लाजमा थैरेपी बहुत पुरानी और परखी हुई पद्धति है। इस थेरेपी का पहली बार प्रथम विश्व युद्ध में इस्तमेला हुआ और इसके बाद 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू के समय भी इसने कई मरीजों की जान बचाई थी। अब आपके जेहन में ये सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ये प्लाज्मा थेरेपी भला होती क्या है। मोटे तौर पर ये कोरोना को हरा चुके मरीजों के खून से दूसरों की जान बचाने का तरीका है। प्लाज्मा थेरेपी में कोरोना वायरस से ठीक हो चुके मरीजों के खून से एंटीबॉडीज लिया जाता है और उनका इस्तेमाल गंभीर रूप से संक्रमित मरीजों के इलाज में किया जाता है। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने भी हाल ही में कोरोना संक्रमण से जूझ रहे लोगों के इलाज के लिए इस बीमारी से ठीक हो चुके लोगों के प्लाज्मा से इलाज को मंजूरी दी है।

यह उपचार प्रणाली इस धारणा पर काम करती है कि जो मरीज किसी संक्रमण से उबर जाते हैं, उनके शरीर में संक्रमण को बेअसर करने वाले प्रतिरोधी एंटीबॉडीज विकसित हो जाते हैं। डॉक्टर नए मरीजों के खून में ठीक हो चुके मरीज का खून डालते हैं और इसके एंटीबॉडीज के जरिए नए मरीज के शरीर में मौजूद वायरस खत्म हो जाता है। दरअसल, जब कोई वायरस किसी शख्स पर हमला करता है तो उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली संक्रमण से लड़ने के लिए प्रोटीन डेवलप करती है और इसी प्रोटीन को एंटीबॉडीज कहा जाता है। अगर कोई संक्रमित व्यक्ति पर्याप्त मात्रा में एंटीबॉडीज विकसित करता है तो वह वायरस से होने वाली बीमारियों से उबर सकता है।

यह होंगे डोनर

  • कोरोना संक्रमण से पूरी तरह जंग जीतने वाले।
  • संक्रमण से उबरने के बाद 14 दिन तक दोबारा लक्षण न दिखे हों।
  • थ्रोट-नेजल स्वाब की रिपोर्ट तीन बार नेगेटिव आई हो।

किसे दी जाएगी कोरोना थैरेपी ?

  • आइसीयू में भर्ती कोरोना संक्रमित, जिनका ब्लड ग्रुप समान हो।
  • ब्लड में ऑक्सीजन 93 फीसद से कम हो।
  • फेफड़े लगातार खराब होते जा रहे हों।

प्लाज्मा थैरेपी की सबसे खास बात ये है कि इसमें कोरोना के ठीक हुए एक मरीज से 2 से 3 मरीजों तक की जान बचाई जा सकती है और ये 2 या 3 मरीज आगे कई और मरीजों को जीवन दान दे सकते हैं।

एक डोनर से बचेगी कई मरीजों की जान

  • जानकारों के मुताबिक एक डोनर 400-600 मिलीलीटर प्लाज्मा दान कर सकता है।
  • एक मरीज के इलाज के लिए 200 मिलीलीटर प्लाज्मा पर्याप्त है।
  • इस तरह एक डोनर से 2 से 3 मरीजों की जान बच सकती है।
  • फिर उन दो मरीजों से चार और मरीज ठीक हो सकते है।
  • भारत में अब तक करीब 3250 मरीज कोरोना से ठीक हो चुके हैं।

प्लाजमा थैरेपी दुनिया के सभी देशों में कई बीमारियों के लिए इस्तेमाल होती रही है और इसने हर बार बेहद शानदार नतीजे दिए हैं। एक बार फिर प्लाजमा थैरेपी से कोरोना के खिलाफ जंग में जीतने के उम्मीद बंधी है। देश में और कई जगह इस तरह के प्रयोग चल रहे हैं। शुरुआती नतीजों ने बता दिया है कि अब हम कोरोना से जंग का सबसे बड़ा हथियार मिल गया है और हमारी जीत पक्की है।

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