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जब सरहदों के बदलने से बंट गया फुटबॉल का 'मुकद्दर', चेकोस्लोवाकियाई फुटबॉल की 'अधूरी' दास्तान!

जब नक्शे पर सरहद की लकीरें खींची जाती हैं, तो क्या सिर्फ जमीन बंटती है? शायद आप कहें कि, ‘बंटवारे की टीस क्या होती है इसका दर्द हम भारतीयों ने बखूबी देखा है.’ लेकिन आज इसी बंटवारे के दर्द का अनकहा अहसास फीफा वर्ल्ड कप 2026 में फिर देखने को मिल रहा है. जहां मैदान पर दौड़ती चेकिया की टीम को देखकर ये सवाल ज़ेहन में आता है, कि कैसे साल 1993 के एक राजनीतिक फैसले ने एक फुटबॉल महाशक्ति के ‘मुकद्दर’ को हमेशा के लिए दो टुकड़ों में बांट दिया.

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अगर आप 80 या 90 के दशक की पैदाइश हैं और खासकर अगर आप उत्तर भारत में पले-बढ़े हैं, तो बचपन का वो किस्सा आपको जरूर याद होगा जब स्कूल की क्लास में अक्सर बच्चों की अंग्रेजी का इम्तिहान लेने के लिए एक शब्द उछाला जाता था, कि ‘चेकोस्लोवाकिया’ की स्पेलिंग बताओ! यकीन मानिए मेरी खुद की क्लास में जो भी स्टूडेंट ‘Czechoslovakia’ की सही स्पेलिंग बता देता था उसे सबसे होशियार बच्चा मान लिया जाता था. बीतते वक्त के साथ वो स्पेलिंग तो हमारे जेहन में रह गई, लेकिन शायद हममें से बहुत से लोग यह भूल गए कि यह देश अब दुनिया के नक्शे पर है ही नहीं.

नक्शे की लकीर और एक ‘अनकहा’ पहलू

दरअसल साल 1993 में ‘वेलवेट डिवीज़न’ हुआ, जिसके जरिए बिना किसी खून-खराबे के यह देश दो टुकड़ों में बंट गया. एक देश बना चेक रिपब्लिक या चेकिया और दूसरा बना स्लोवाकिया. आज जब फीफा वर्ल्ड कप 2026 का रोमांच पूरी दुनिया के सिर चढ़कर बोल रहा है, तो इस महाकुंभ को देखते हुए मेरा ध्यान एकाएक इतिहास के इसी अनकहे और थोड़े गंभीर पहलू पर चला गया. यह आर्टिकल इसी बात पर आधारित है कि कैसे एक राजनीतिक बंटवारे ने फुटबॉल की एक साझी विरासत के मुकद्दर को हमेशा के लिए बदल दिया.

2 दशक के सूखे के बाद चेकिया की वापसी

इस बार के फीफा वर्ल्ड कप 2026 के शेड्यूल पर नजर डालें तो ठीक दो दशक के लंबे सूखे के बाद, चेक रिपब्लिक की टीम आखिरकार वर्ल्ड कप के मुख्य मंच पर खेल रही है. वैसे ग्रुप-A में मौजूद इस टीम का सफर आसान नहीं है. साउथ कोरिया के खिलाफ उनके कड़े पहले मुकाबले के बाद अब उनके सामने साउथ अफ्रीका और मेजबान मेक्सिको जैसी टीमों की चुनौती हैं. अनुभवी कोच मिरोस्लाव कौबेक के मार्गदर्शन और कप्तान लाडिसलाव क्रेइची व पेट्रिक शिख जैसे स्टार खिलाड़ियों की ताकत के भरोसे उतरी इस टीम को लेकर फैंस की उम्मीदें सातवें आसमान पर हैं. लेकिन चेकिया का मैदान पर दौड़ना सिर्फ एक टीम का रिव्यू नहीं है, यह अतीत के पन्नों को पलटने जैसा है.

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बंटवारे से पहले फुटबॉल की ‘महाशक्ति’

मॉर्डन फुटबॉल के दौर में मेसी और रोनाल्डो की दीवानी आज की जनरेशन शायद यह बात नहीं जानती होगी, लेकिन इतिहास की चेकोस्लोवाकियाई टीम कोई आम टीम नहीं थी. यह टीम फुटबॉल की वो महाशक्ति थी जिसने 1934 और फिर 1962 में फीफा वर्ल्ड कप के फाइनल का सफर तय किया था. 1976 में जब इस साझी टीम ने यूरोपियन चैंपियनशिप जीती, तो पेनाल्टी शूटआउट में एंटोनिन पनेन्का की जादुई किक आज भी ‘पनेन्का किक’ के नाम से फुटबॉल इतिहास की सबसे यादगार किक्स में गिनी जाती है. फीफा वर्ल्ड कप के मंच पर भी साझी चेकोस्लोवाकियाई टीम का प्रदर्शन कई ऐतिहासिक जीत का गवाह रहा है.

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1990 में आखिरी बार खेल एक साथ

बॉलीवुड की कई फिल्मों की शूटिंग चेक रिपब्लिक की ऐतिहासिक राजधानी प्राग और स्लोवाकिया की खूबसूरत राजधानी ब्रातिस्लावा में हुई है. बंटवारे से पहले इन दोनों शहरों की गली-गली तक फुटबॉल का रोमांच एक जैसा हुआ करता था. किस्मत का संयोग देखें कि साझा चेकोस्लोवाकिया के आखिरी बार 1990 में इटली में खेले गए फीफा वर्ल्ड कप में खेलने के बाद ये कहानी बदल गई. उस वर्ल्ड कप में एक साथ खेलते हुए चेकोस्लोवाकिया की टीम टूर्नामेंट के क्वार्टर फाइनल तक पहुंची. जिसके बाद, खेल की यह साझी विरासत हमेशा के लिए दो हिस्सों में बंट गई.

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बड़े नामों के बावजूद चेकिया का सूखा

कहते हैं कि तब फुटबॉल के बड़े-बड़े पंडितों को लगा था कि बंटवारे के बाद दोनों देश अपने दम पर फुटबॉल की दुनिया में नया इतिहास लिखेंगे, लेकिन हकीकत की पिच बेहद कठिन साबित हुई. चेक रिपब्लिक ने दुनिया को पेट्र चेक, पावेल नेदवेद और थॉमस रोसिका जैसे फुटबॉल के कई बड़े ग्लोबल आइकॉन दिए. इन खिलाड़ियों ने दुनिया के बड़े क्लबों और इंटरनेशनल फुटबॉल के मंच पर अपनी अमिट छाप छोड़ी.हालांकि चेकिया की एक अलग वैश्विक पहचान बनी, लेकिन फीफा वर्ल्ड कप के मोर्चे पर उसका संघर्ष जारी रहा. जैसा कि मैंने पहले बताया कि 2026 में खेलने से पहले, आखिरी बार साल 2006 से चेकिया एक बार भी फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाया था.

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स्लोवाकिया की 2010 वाली इकलौती चमक

दूसरी तरफ स्लोवाकिया की कहानी और भी ज्यादा संघर्षपूर्ण है. आजाद मुल्क बनने के बाद स्लोवाकिया अपने पूरे इतिहास में सिर्फ एक बार, साल 2010 के वर्ल्ड कप में क्वालीफाई कर पाया था. हालांकि वहां उन्होंने इटली जैसी दिग्गज टीम को हराकर प्री-क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय करके अपनी ताकत दिखाई थी, लेकिन वो सिर्फ एक चमक थी. फुटबॉल इतिहास में हम्सिक और स्क्रीनियर जैसे वर्ल्ड क्लास खिलाड़ी देने के बाद भी स्लोवाकिया आज तक बड़े मंचों पर अपनी उपस्थिति के लिए लगातार जूझ रहा है और इस बार भी वह इस रेस से बाहर है.

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दो मुल्क, दो मैदान और एक साझी कसक

वैसे खेल आयोजनों की बात करें तो फीफा वर्ल्ड कप दुनिया में ओलंपिक के बाद दूसरा सबसे बड़ा खेल आयोजन है. लेकिन लोकप्रियता और रोमांच के पैमाने पर ये दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन कहा जा सकता है. 2026 में आज जब चेकिया के फैंस वर्ल्ड कप के स्टेडियमों में अपनी टीम को चीयर कर रहे हैं, तो ब्रातिस्लावा में बैठे स्लोवाकियाई फैंस के दिलों में यकीनन एक अधूरी कशिश टीस देती होगी. सवाल ये है कि प्राग के मैदानों में जो फुटबॉल की गूंज है, क्या वैसी ही दीवानगी ब्रातिस्लावा के स्टेडियमों में नहीं ? आखिर क्यों जब सरहद रूपी लकीरें नक्शे पर खींची जाती हैं, तो खेल का डीएनए भी बदल जाता है?

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