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अंतरिक्ष की दुनिया जितनी खूबसूरत दिखती है उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी है और वहां रोना भी एक बड़ी मुसीबत बन सकता है. तकनीकी तौर पर अंतरिक्ष यात्री रो तो सकते हैं लेकिन गुरुत्वाकर्षण न होने की वजह से उनके आंसू वैसे नहीं गिरते जैसे धरती पर गिरते हैं.
आंसू क्यों नहीं गिरते?

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धरती पर ग्रेविटी आंसुओं को आंखों से खींचकर गालों के नीचे ले आती है लेकिन स्पेस के जीरो ग्रेविटी माहौल में सब कुछ तैरता रहता है. वहां आंसू आंखों से निकलकर नीचे गिरने के बजाय वहीं चिपक जाते हैं और एक छोटे तरल बुलबुले की तरह बनने लगते हैं.
क्या है खतरा?

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अंतरिक्ष यात्री क्रिस हैडफील्ड के मुताबिक वहां आंसू आंखों से नहीं गिरते बल्कि पूरी आंख को ढक लेते हैं जिससे सब कुछ धुंधला दिखने लगता है. अगर यह पानी का बुलबुला ज्यादा बड़ा हो जाए तो यह नाक तक पहुंच सकता है और सांस लेने में भी दिक्कत पैदा कर सकता है.
कैसे हटाते हैं?

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चूंकि आंसू अपने आप नहीं गिरते इसलिए अंतरिक्ष यात्रियों को इन आंसुओं के बुलबुलों को तौलिए या हाथ से मैनुअली पोंछना पड़ता है. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो आंसुओं में मौजूद नमक आंखों में तेज जलन पैदा करेगा और यह पानी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को भी खराब कर सकता है.
पसीना भी समस्या?

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सिर्फ आंसू ही नहीं बल्कि पसीना भी अंतरिक्ष में एक बड़ी समस्या है क्योंकि वह भी शरीर से नीचे नहीं टपकता है. पसीना त्वचा पर एक गीली चादर की तरह चिपक जाता है जिसे लगातार पोंछना पड़ता है वरना यह आंखों और कान के अंदर घुसकर परेशानी खड़ी कर सकता है.
कैसा है अनुभव?

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अंतरिक्ष में इंसान का शरीर वही रहता है लेकिन वहां का अनोखा वातावरण भावनाओं को व्यक्त करने का तरीका पूरी तरह बदल देता है. वहां रोना सिर्फ एक अहसास नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक चुनौती है जिसे पार करना हर अंतरिक्ष यात्री के लिए सुरक्षा का बड़ा हिस्सा होता है.