क्या होगा अगर अंतरिक्ष में बह गए हमारे आंसू? अंजाम सोच भी नहीं सकते आप
क्या आपने कभी सोचा है कि अंतरिक्ष की जीरो ग्रेविटी में रोना कितना भारी पड़ सकता है? वहां आंखों से निकलने वाले आंसू गालों पर गिरने के बजाय जानलेवा खतरा कैसे बन जाते हैं?

आंसू क्यों नहीं गिरते?
2 / 6धरती पर ग्रेविटी आंसुओं को आंखों से खींचकर गालों के नीचे ले आती है लेकिन स्पेस के जीरो ग्रेविटी माहौल में सब कुछ तैरता रहता है. वहां आंसू आंखों से निकलकर नीचे गिरने के बजाय वहीं चिपक जाते हैं और एक छोटे तरल बुलबुले की तरह बनने लगते हैं.
क्या है खतरा?
3 / 6अंतरिक्ष यात्री क्रिस हैडफील्ड के मुताबिक वहां आंसू आंखों से नहीं गिरते बल्कि पूरी आंख को ढक लेते हैं जिससे सब कुछ धुंधला दिखने लगता है. अगर यह पानी का बुलबुला ज्यादा बड़ा हो जाए तो यह नाक तक पहुंच सकता है और सांस लेने में भी दिक्कत पैदा कर सकता है.
कैसे हटाते हैं?
4 / 6चूंकि आंसू अपने आप नहीं गिरते इसलिए अंतरिक्ष यात्रियों को इन आंसुओं के बुलबुलों को तौलिए या हाथ से मैनुअली पोंछना पड़ता है. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो आंसुओं में मौजूद नमक आंखों में तेज जलन पैदा करेगा और यह पानी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को भी खराब कर सकता है.
पसीना भी समस्या?
5 / 6सिर्फ आंसू ही नहीं बल्कि पसीना भी अंतरिक्ष में एक बड़ी समस्या है क्योंकि वह भी शरीर से नीचे नहीं टपकता है. पसीना त्वचा पर एक गीली चादर की तरह चिपक जाता है जिसे लगातार पोंछना पड़ता है वरना यह आंखों और कान के अंदर घुसकर परेशानी खड़ी कर सकता है.
कैसा है अनुभव?
6 / 6अंतरिक्ष में इंसान का शरीर वही रहता है लेकिन वहां का अनोखा वातावरण भावनाओं को व्यक्त करने का तरीका पूरी तरह बदल देता है. वहां रोना सिर्फ एक अहसास नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक चुनौती है जिसे पार करना हर अंतरिक्ष यात्री के लिए सुरक्षा का बड़ा हिस्सा होता है.
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