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मिडिल ईस्ट में चल रही जंग का आज 34वां दिन है. ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच जारी इस जंग के कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा हो गया है. इस युद्ध के कारण भारत में भी एलपीजी की सप्लाई पर असर पड़ा है. इस संकट के बीच बचपन से हमारे घरों में इस्तेंमाल होने वाला साथी केरोसिन तेल एक बार फिर से दस्तक दे रहा है. आपने बचपन में भी जरूर सुना होगा कि लोग इसे मिट्टी का तेल कहते थे. तो क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इसे मिट्टी का तेल क्यों कहते हैं? जबकि इसका नाम तो केरोसिन है. क्या यह सच में मिट्टी से निकलता है या फिर इसके पीछे कोई और कारण है? आज हम जानेंगे इस नीले तेल की सच्चाई और इसके नाम के पीछे छिपी कहानी.
क्या सच में मिट्टी से बनता है केरोसिन?

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अक्सर लोगों को लगता है कि जिस तरह से सरसों का तेल सरसों से निकाला जाता है, तिल का तेल तिल से और मूंगफली का तेल मूंगफली से तो ठीक वैसे ही मिट्टी का तेल भी मिट्टी से निकाला या बनाया जाता होगा. लेकिन विज्ञान की नजर में यह धारणा पूरी तरह से गलत और निराधार है. असल में केरोसिन तेल एक पेट्रोलियम प्रोडक्ट है. यह उसी कच्चे तेसल से रिफाइन करके निकाला जाता है, जिससे पेट्रोल और डीजल बनते हैं.
क्यों कहते हैं मिट्टी का तेल?

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आपको बता दें कि केरोसिन को मिट्टी का तेल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका जो स्त्रोत है वो जमीन के नीचे की गहराइयों में छिपा होता है. मिट्टी के नीचे से निकलने के कारण ही लोगों ने इसे आम बोल चाल की भाषा में मिट्टी का तेल कहना शुरू कर दिया.
जमीन से निकलकर ऐसे होता है रिफाइन

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कच्चा तेल जमीन के अंदर हजारों फीट नीचे मौजूद होता है. जब इस कच्चे तेल को बाहर निकालकर रिफाइनरी में साफ किया जाता है, तो अलग-अलग तापमान पर पेट्रोल, डीजल और केरोसिन जैसी चीजें अलग होती हैं. तकनीकी रूप से इसे फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन कहा जाता है. वहीं, केरोसिन का निर्माण इस प्रक्रिया के खास चरण में होता है. चूंकि यह पूरी तरह से जमीन के अंदर मौजूद जीवाश्म ईंधन से जुडा़ होता है, इसलिए भारत के ग्रामीण और शहरी इलाकों में इसे जमीन से जोड़ने वाला नाम दिया गया.
केरोसिन को क्यों कहते हैं घासलेट?

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भारत के कई हिस्सों में खासकर महाराष्ट्र और उत्तर भारत के कुछ इलाकों में केरोसिन को घासलेट भी कहते हैं. यह नाम सुनने में जितना देसी लग रहा है, इसकी जड़ें उतनी ही विदेशी हैं. दरअसल, पुराने समय में जब विदेशों से गैस से चलने वाली लाइटें भारत आईं, तो ग्रामीण भारतीयों के लिए गैस लाइट शब्द बोलना थोड़ा मुश्किल था. धीरे-धीरे लोगों ने इसका नाम बिगाड़ दिया और अपनी सुविधा के अनुसार, घासलेट बोलना शुरू कर दिया. आज भी बुजुर्गों की जुबान पर केरोसिन के लिए यही नाम चढ़ा हुआ है.
लोगों को फिर से आई केरोसिन की याद

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एक दौर था जब भारत के घरों में बिजली और एलपीजी सिलेंडर का नाम तक नहीं था. उस समय केरोसिन ही था जो भारत के घरों में उजाला लेकर आता था और घरों में चूल्हा जलाता था. यहां तक कि लालटेन और लैंप तक में भी इसी घासलेट का इस्तेमाल होता था. खाना पकाने के लिए लोगों ने स्टोव में केरोसिन का इस्तेमाल किया था. इसके बाद हालांकि समय के साथ गैस सिलेंडरों ने इसकी जगह ले ली, लेकिन इस दौरान वैश्विक संकट और एलपीजी की किल्लत के दौरान लोगों को एक बार फिर से केरोसिन की याद आ गई है.