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खाने के दौरान स्मार्टफोन का अत्यधिक इस्तेमाल कितना घातक हो सकता है, इसे लेकर एक नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. आज के समय में बच्चों से लेकर युवाओं और कई तो बुजुर्ग भी खाने के समय दूसरे हाथ में स्मार्टफोन रखते हैं और मुंह के साथ फोन में भी स्क्रोलिंग चलती रहती है. अगर आप भी ऐसी आदत से मजबूर हैं तो ये खबर आपके लिए ही है.
खाने के दौरान स्मार्टफोन का अत्यधिक

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इस्तेमाल कितना घातक हो सकता है, इसे लेकर एक नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. आज के समय में बच्चों से लेकर युवाओं और कई तो बुजुर्ग भी खाने के समय दूसरे हाथ में स्मार्टफोन रखते हैं और मुंह के साथ फोन में भी स्क्रोलिंग चलती रहती है. अगर आप भी ऐसी आदत से मजबूर हैं तो ये खबर आपके लिए ही है.
खाने के समय फोन इस्तेमाल करने का खतरा

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जब युवा खाते वक्त स्मार्टफोन पर चिपके रहते हैं, तो भावनात्मक रूप से ज्यादा खाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है. तनाव या उदासी में खाना खाना आम हो जाता है, जो बिना किसी आधिकारिक बीमारी के भी चेतावनी संकेत देता है. 'मेडिकल इंटरनेट रिसर्च' जर्नल की स्टडी बताती है कि फोन की बिना बेचैनी महसूस करना ही समस्या की जड़ है.
52,000 से ज्यादा युवाओं पर हुई स्टडी

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35 स्टडीज और 52,000 से ज्यादा युवाओं (औसत उम्र 17 वर्ष) पर आधारित यह शोध वैश्विक समस्या को रेखांकित करता है. टीनएजर्स अपनी पहचान दूसरों से तुलना करके बनाते हैं, इसलिए सोशल मीडिया के आदर्श शरीर चित्र असंतोष पैदा करते हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि सात घंटे से अधिक फोन का रोजाना इस्तेमाल से परिणाम घातक हो सकते हैं.
खान-पान विकारों की समस्या

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अत्यधिक फोन उपयोग और खाने के विकृत व्यवहार में सीधा लिंक पाया गया है. ओवरइटींग, अनियंत्रित खाना और भोजन की लत इसके प्रमुख उदाहरण हैं. युवा तनाव में खाकर अपनी भावनाओं को दबाने की कोशिश करते हैं, जो लंबे समय में गंभीर विकारों का रूप ले लेता है.
सात घंटे की डेड लाइन

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दिन में सात घंटे से ज्यादा फोन चलाने वाले युवाओं में नकारात्मक प्रभाव कई गुना बढ़ जाते हैं. यह थ्रेशोल्ड स्टडी में स्पष्ट रूप से उभरा, जहां सामान्य उपयोग से तुलना की गई. इससे बचाव के लिए समय सीमा तय करना जरूरी बताया गया है.
शरीर का अचानक वजन बढ़ना

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फोन पर लगातार आदर्श बॉडी इमेज देखने से युवा अपने शरीर से नाखुश हो जाते हैं. ऑनलाइन कंटेंट की वजह से नकारात्मक आत्मदृष्टि विकसित होती है. यह समस्या खासकर किशोरावस्था में पहचान निर्माण के दौरान गंभीर हो जाती है. ड्राइविंग या चलते समय फोन उपयोग हादसों की संभावना कई गुना बढ़ा देता है. सुरक्षा के लिहाज से यह लत जानलेवा साबित हो सकती है. जागरूकता अभियान और नियम इस समस्या को कम करने में सहायक हैं.
और भी होती हैं समस्याएं

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सिर्फ स्क्रीन टाइम नहीं, बल्कि 'समस्या स्मार्टफोन उपयोग' (PSU) ही मुख्य खतरा है. इसमें फोन छीनने पर गुस्सा, बेचैनी या नियंत्रण की कमी शामिल है. दैनिक जीवन में परेशानी पैदा होने पर इसे मानसिक निर्भरता कहते हैं. काम या पढ़ाई के दौरान फोन की वजह से एकाग्रता भंग होती है. लगातार distractions लक्ष्यों को प्रभावित करते हैं. परिणामस्वरूप प्रदर्शन गिरता है और समय की बर्बादी बढ़ जाती है.
मानसिक स्वास्थ्य पर असर

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स्मार्टफोन की लत चिंता, अवसाद और एकाकीपन को बढ़ावा देती है. सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना नकारात्मक सेल्फ इमेज बनाती है. लंबे समय तक उपयोग नींद की कमी और मूड स्विंग्स का कारण बनता है. लंबे समय फोन देखने से आंखों पर जोर, नींद बाधित और बैठे रहने की आदत बढ़ती है. इससे मोटापा, मुद्रा संबंधी समस्याएं और शारीरिक कमजोरी आम हो जाती है. सक्रिय जीवनशैली अपनाना इस खतरे से बचाव का तरीका है.