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आज जिसे हम अफगानिस्तान कहते हैं वह सालों पहले अखंड भारत का एक बेहद अहम और अभिन्न हिस्सा हुआ करता था. सम्राट अशोक के दौर में यहां बौद्ध धर्म का बोलबाला था और उनके शिलालेख आज भी इस बात की गवाही देते हैं.
कब शुरू हुआ अलगाव का खेल?

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इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि 18वीं सदी में मुगल साम्राज्य के कमजोर पड़ते ही विदेशी हमलावरों की नजर इस भूभाग पर टिक गई थी. ईरान के ताकतवर शासक नादिर शाह ने मुगलों की कमजोरी का फायदा उठाकर कंधार जैसे इलाकों को भारत से छीनना शुरू कर दिया था.
क्या थी वो ऐतिहासिक संधि?

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26 मई 1739 की वह तारीख भारतीय इतिहास के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुई जब मुगल शासक शाह रंगीला और नादिर शाह के बीच एक समझौता हुआ. करीब 287 साल पहले हुई इस संधि के कारण भारत को अपना एक बहुत बड़ा इलाका हमेशा के लिए खोना पड़ा था.
कैसे हाथ से निकला काबुल-गजनी?

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नादिर शाह ने अपनी ताकत के दम पर सबसे पहले कंधार पर कब्जा किया और फिर धीरे-धीरे गजनी और काबुल के उन इलाकों को भी अपने साथ मिला लिया. ये वो इलाके थे जो सदियों से मुगलों और भारत के अधिकार क्षेत्र में आते थे लेकिन कमजोर नेतृत्व के कारण हाथ से निकल गए.
क्या है सम्राट अशोक का कनेक्शन?

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प्राचीन काल में अफगानिस्तान का एक बड़ा हिस्सा महान सम्राट अशोक के साम्राज्य की शोभा बढ़ाता था जहां उन्होंने शांति का संदेश फैलाया था. वहां आज भी मिलने वाले पुराने अवशेष और ऐतिहासिक प्रमाण इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह भूमि कभी भारतीय संस्कृति का केंद्र थी.
क्या कहता है आधुनिक इतिहास?

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इंटरनेट पर मौजूद अलग-अलग रिपोर्ट्स के अनुसार मुगलों के समय हुई उस एक संधि ने भारत की भौगोलिक सीमा को हमेशा के लिए छोटा कर दिया. आज अफगानिस्तान एक अलग राष्ट्र है लेकिन इसकी जड़ें और प्राचीन इतिहास कहीं न कहीं भारत की मिट्टी से ही जुड़ा हुआ नजर आता है.