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What is Thundersquall: उत्तर प्रदेश में बुधवार को आए भीषण तूफान ने जिस तरह की तबाही मचाई, उसने सबको झकझोर कर रख दिया है. भदोही और फतेहपुर समेत कई जिलों में बिजली गिरने और आंधी की चपेट में आने से अब तक 89 लोगों की जान जा चुकी है. लेकिन क्या आपने सोचा है कि आखिर ये 'थंडरस्क्वाल' क्या बला है, जो महज कुछ ही मिनटों में मौत का पैगाम लेकर आई? आइए, आसान भाषा में समझते हैं इसके पीछे का विज्ञान.
क्या होता है 'थंडरस्क्वाल'?

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मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, जब तेज कड़कड़ाती बिजली और भारी बारिश के साथ अचानक 50 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलती हैं, तो उसे 'थंडरस्क्वाल' कहते हैं. यह सामान्य आंधी से कई गुना ज्यादा ताकतवर होता है. इसकी सबसे डरावनी बात यह है कि यह बहुत कम समय के लिए आता है, लेकिन इसकी तीव्रता इतनी ज्यादा होती है कि बड़े-बड़े पेड़ों और बिजली के खंभों को उखाड़ फेंकता है.
भीषण गर्मी में क्यों हुआ यह इतना खतरनाक?

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मई के महीने में जब पारा 40-45 डिग्री के पार पहुंच जाता है, तो जमीन बहुत ज्यादा गर्म हो जाती है. ऐसे में जमीन की गर्म हवा तेजी से आसमान की तरफ उठती है. जब यह गर्म हवा ऊपर जाकर नमी वाली ठंडी हवा से टकराती है, तो विशाल काले बादलों का निर्माण होता है. यही हवा जब ठंडी होकर नीचे गिरती है, तो एक बड़े विस्फोट की तरह जमीन पर प्रहार करती है. यूपी में बुधवार को यही हुआ. भीषण गर्मी और 'वेस्टर्न डिस्टरबेंस' के मेल ने इसे 'किलर' बना दिया.
हवाओं का वह 'स्टीयरिंग व्हील' जिसने बदली दिशा

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मौसम विज्ञान में 'जेट स्ट्रीम' को हवा की एक तेज बहने वाली नदी माना जाता है. यह हमारे वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में स्थित होती है और सतह के मौसम के लिए किसी कार के 'स्टीयरिंग व्हील' की तरह काम करती है. जब कोई 'वेस्टर्न डिस्टर्बेंस' (पश्चिमी विक्षोभ) सक्रिय होता है, तो यह स्टीयरिंग व्हील हवाओं को एक खास दिशा में मोड़ देता है, जिससे एक खतरनाक चेन रिएक्शन शुरू हो जाता है.
'एटमॉस्फेरिक इंस्टेबिलिटी' का नतीजा

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'साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट' में छपे शोध की मानें तो मानसून से पहले यानी गर्मियों के मौसम में आने वाली ये आंधियां और बिजली गिरने की घटनाएं 'एटमॉस्फेरिक इंस्टेबिलिटी' का नतीजा हैं. तबाही से ठीक 24 घंटे पहले IMD ने 50 से 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलने की चेतावनी दी थी. वायुमंडल में बारूद की तरह स्थितियां पहले से ही तैयार थीं, बस एक ट्रिगर की जरूरत थी, जो वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के रूप में सामने आया और 89 जिंदगियां काल के गाल में समा गईं.
क्यों नहीं संभल पाए लोग?

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इस तूफान की रफ्तार इतनी तेज थी कि लोगों को घर के अंदर भागने तक का मौका नहीं मिला. भदोही और फतेहपुर जैसे इलाकों में कई मौतें पेड़ गिरने और कच्ची दीवारें ढहने की वजह से हुईं. अगर आसमान का रंग अचानक गहरा काला या पीला होने लगे और तेज ठंडी हवाएं चलने लगें, तो समझ जाइए कि खतरा करीब है. ऐसी स्थिति में कभी भी पेड़ के नीचे, बिजली के खंभों के पास या कच्ची छत के नीचे न रुकें. किसी पक्के मकान या सुरक्षित इमारत में शरण लेना ही जान बचा सकता है.