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क्या आप किसी ऐसी जगह जा सकते हैं जहां आपके बिस्तर के चंद किलोमीटर नीचे धरती का सबसे खौफनाक लावा उबल रहा हो? सिर्फ इतना ही नहीं इस जगह पर रात के समय आसमान का रंग खूनी लाल हो जाता है. यह नजारा किसी डरावनी फिल्म का दृश्य नहीं बल्कि अफ्रीका के लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो के शहर गोमा की सच्चाई है. आज आपको बताएं इस शहर के लावा की कहानी.
शहर में रहती है 20 लाख की आबादी

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आपको बता दें कि इस शहर में करीब 20 लाख लोग रहते हैं और ये लोग हर दिन अपनी जान को जोखिम में डालते हैं. यहां लोग हर सुबह का सूरज इस प्रार्थना के साथ देखते हैं कि कहीं जमीन न फट पड़े. दुनिया इस शहर को 'सिटी ऑफ वोल्केनो' भी कहती है. यहां कभी भी जमीन के अंदर उबल रहा लावा जमीन फाड़कर बाहर आ सकता है. इसीलिए इस जगह या शहर को रहने के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक शहर माना जाता है.
शहर में दहक रहा माउंट न्यारागोंगो

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यहां दोतरफा मौत का घेरा है. गोमा की भौगोलिक स्थिति दुनिया के किसी भी अन्य शहर से ज्यादा खतरनाक है. इस शहर के एक तरफ दहकता 'माउंट न्यारागोंगो' है. शहर के उत्तर में खड़ा यह पहाड़ दुनिया की सबसे बड़ी 'लावा झील' को अपने सीने में दबाए बैठा है. यहां का लावा 'लिक्विड' यानी तरल होता है, जो पानी की तरह बहता है. 2021 में जब इसमें विस्फोट हुआ था, तब लावा 60 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से शहर की ओर बढ़ा. लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला. ताजा सैटेलाइट तस्वीरें चेतावनी दे रही हैं कि फिर एक बार पहाड़ के क्रेटर में लावा का स्तर खतरनाक ऊंचाई तक पहुंच गया है.
पूरे शहर का घुट सकता है दम

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वहीं, जानकारी अनुसार, इस शहर की दूसरी ओर किवु झील है, जिसे गैस चेंबर कहते हैं. इसकी गहराइयों में मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड का इतना विशाल भंडार है कि एक छोटा सा भूकंप भी इसे लिम्निक इरप्शन यानी गैस रिसाव में बदल सकता है, जिससे पूरे शहर का दम घुट सकता है.
लावा की राख से बनाते हैं घर

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इतनी खतरनाक स्थिति के बाद भी यहां के लोग इसी जगह पर सर्वाइव कर रहे हैं. उनका जज्बा दुनिया को हैरान कर देता है और यहां की आबादी लगातार बढ़ रही है. अब यहां पर रहने वाले लोगों ने ज्वालामुखी के साथ एक अजीब समझौता कर लिया है. गोमा की सड़कों पर जो काली चट्टानें दिखती हैं, वे जमा हुआ लावा हैं. यहां के लोग इसी लावे को काटकर ईंटें बनाते हैं और अपने घर खड़े करते हैं. जिस आग ने उनका घर खाक किया, उसी की राख से वे नया आशियाना बनाते हैं.
बिना खाद के लहलहाती हैं फसलें

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बता दें कि यहां की मिट्टी भी बहुत ही ज्यादा उपजाऊ है, ज्वालामुखी की राख के कारण. यहां की फसलें बिना खाद के भी लहलहाती हैं. इसके अलावा, यह एक बड़ा एडवेंचर टूरिस्ट स्पॉट भी है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था चलती है. दुनियाभर से बड़ी संख्या में लोग ज्वालामुखी से फटे पहाड़ देखने यहां आते हैं.
अनोखा है यहां के लोगों का लाइफस्टाइल

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यहां की लाइफस्टाइल की सबसे अनोखी चीज है 'चुकुडु' यानी लकड़ी से बनी विशाल साइकिल. सड़कों पर सामान ढोते सैकड़ों चुकुडु चालक इस बात का प्रमाण हैं कि यहां की जिंदगी मशीनों से ज्यादा इंसानी पसीने और जिद्द पर टिकी है. यहां की जमीन भले काली और बेरंग है लेकिन यहां की संस्कृति बेहद रंगीन है. महिलाएं चटकीले रंगीन कपड़ों से बनी तोशितेंगी पहनती हैं, जो उनके संघर्षपूर्ण जीवन में रंग भरने का तरीका है. लावा की चट्टानों से बचने के लिए लोग मोटे तलवे वाले रबर बूट पहनते हैं. यहां का मुख्य भोजन 'फुफू' है जो कसावा या मक्के के आटे से बनी होती है और किवु झील की 'साम्बासा' मछलियां हैं. यहां की ज्वालामुखी पहाड़ वाली कॉफी दुनिया भर में मशहूर है.
वैज्ञानिक रखते हैं स्थिति पर नजर

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एक अनोखी मान्यता भी है यहां के लोगों में. घर बनाते समय लोग नींव में ज्वालामुखी की ठंडी राख डालते हैं, ताकि 'पहाड़ का देवता' शांत रहे. यही विश्वास उन्हें सुकून की नींद सोने देता है. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं गोमा को एक 'रुके हुए टाइम बम' के रूप में देखती हैं. भूगर्भशास्त्री चौबीसों घंटे यहां जमीन के अंदर चल रही सिस्मिक घटनाओं पर निगरानी रखते हैं. आधुनिक सेंसर, अर्ली वार्निंग सायरन और रेडियो अपडेट के जरिए लोगों को जानकारी दी जाती है. अब सुरक्षित रूट के 'डिजिटल मैप्स' भी मोबाइल पर उपलब्ध हैं.