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हाल ही में अमरावती को आंध्र प्रदेश की स्थायी राजधानी घोषित करने का फैसला सामने आया है. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि सैकड़ों साल पहले जब मुगलों का शासन था, तब राजधानी बदलने की प्रक्रिया क्या थी? क्या उस जमाने में भी कोई लिखित आदेश या नोटिफिकेशन जारी किया जाता था? तो आज हम जानेंगे कि मुगलों के दौर में आखिर किसी शहर की राजधानी बदलने की प्रक्रिया क्या होती थी.
अमरावती का नया दौर

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आंध्र प्रदेश को अपनी राजधानी का पिछले कई सालों से इंतजार था और इसे लेकर लंबे समय से विवाद भी चल रहा था जो अब थम गया है. बता दें कि भारत सरकार ने सोमवार को गजट नोटिफिकेशन जारी कर अमरावती को आधिकारिक और स्थायी राजधानी का दर्जा दे दिया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा आंध्र प्रदेश पुर्नगठन (संशोधन) विधेयक, 2026 को मंजूरी मिलने के बाद यह संभव हो पाया है. यह नया कानून 2 जून 2024 से प्रभावी माना जाएगा.
मुगलों के दौर में कैसे बदलती थी राजधानी?

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मुगल काल में आज की तरह हो रही लिखित संविधान या फिर संसद नहीं थी. उस समय बादशाह की जुबान ही काफी होती थी और उसे ही कानून भी माना जाता था. जब भी कोई मुगल सम्राट अपनी राजधानी बदलने का फैसला करता, तो वह दरबार में इसका औपचारिक ऐलान करता था. इसे शाही फरमान कहा जाता था. इस फरमान पर बादशाह की खास मुहर लगी होती थी और इसे दूतों के जरिए साम्राज्य के सभी सूबेदारों और महत्वपूर्ण अधिकारियों तक पहुंचा दिया जाता था. यही उस दौर का नोटिफिकेशन होता था.
आगरा से हुई थी शुरुआत

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मुगल साम्राज्य की शुरुआती नींव बाबर ने 1526 में आगरा में रखी थी. आगरा को राजधानी बनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण इसकी भौगोलिक स्थिति थी. यह उत्तर भारत के बिल्कुल केंद्र में था, जहां से पूरे इलाके पर नजर रखना काफी आसान था. हुमायूं और अकबर के शुरुआती सालों में भी आगरा ही सत्ता का मुख्य केंद्र बना रहा, लेकिन मुगलों की यह फितरत थी कि वे अपनी जरूरतों और सैन्य अभियानों के हिसाब से अपने रहने की जगह और दरबार बदलते रहते थे.
सीमा सुरक्षा के लिए लाहौर बनी राजधानी

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अकबर के शासनकाल में उत्तर-पश्चिमी सीमाओं, खासकर अफगानिस्तान की तरफ से विद्रोह का खतरा बढ़ गया था. इन विद्रोहों को खत्म करने और साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए अकबर ने 1580 के दशक में अपनी राजधानी लाहौर में स्थानांतरित कर दी. यह दिखाता है कि मुगलों के लिए राजधानी सिर्फ एक ऐश-ओ-आराम की जगह नहीं थी बल्कि यह युद्ध जीतने का एक मोर्चा भी थी. कई सालों तक लाहौर से ही पूरे भारत का शासन चलाया जाता रहा.
फतेहपुर कैसे बनी थी राजधानी?

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1570 के दशक में अकबर ने एक क्रांतिकारी फैसला सुनाया था. अकबर ने आगरी की भीड़ से दूर सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के सम्मान में एक नया शहर बनाने का ऐलान किया, जिसे हम आज के समय में फतेहपुर सीकरी के नाम से जानते हैं. यह शहर स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना था. हालांकि यहां राजधानी ज्यादा समय तक नहीं चल सकी. पानी की भारी कमी और रणनीतिक कारणों से अकबर को यह शानदार शहर छोड़ना पड़ा था जो आज भी मुगलों की अधूरी ख्वाइशों की गवाह है.
शाहजहांनाबाद का उदय और दिल्ली बनी राजधानी

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मुगल इतिहास में राजधानी बदलने का सबसे बड़ा और भव्य उदाहरण शाहजहां के दौर में मिलता है. 1638 में शाहजहां ने फैसला किया कि वह आगरा से अपनी राजधानी दिल्ली ले आएगा. इसके लिए उसने यमुना नदी के किनारे एक नियोजित शहर बसाया, जिसे शाहजहांनाबाद (पुरानी दिल्ली) नाम दिया गया था. लाल किला और जामा मस्जिद इसी दौर की देन हैं. आगरा में लगातार लोगों की भीड़ बढ़ रही थी और गर्मी से बचने के लिए शाहजहां ने दिल्ली को अपनी सत्ता का स्थायी ठिकाना बना लिया था. जिसे आज हम भारत की राजधानी कहते हैं.
इस तरह किया जाता था राजधानी का विस्थापन

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मुगलों के लिए राजधानी बदलने की प्रक्रिया कुछ घंटों या फिर रातों रात नहीं होती थी. जब शाहजहां ने दिल्ली जाने का फैसला किया तो पहले शहर का नक्शा बनाया गया और उसके बाद निर्माण कार्य शुरू किया गया. जब कोई भी राजधानी बदलता था तो सिर्फ बादशाह ही नहीं चलता था बल्कि पूरा शाही खजाना, सेना की टुकड़ियां, हजारों दरबारी और सरकारी दस्तावेज भी साथ चलते थे. यह एक बड़ा काफिला होता था जिसकी सूचना पहले से ही शाही आदेशों द्वारा दे दी जाती थी जिससे सुरक्षा पुख्ता हो सके.