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जब आप किसी भी पुराने भारतीय शहर की घनी गलियों से निकलकर चौड़ी सड़कों, पुराने पेड़ों और बड़े-बड़े बंगलों वाले शांत इलाके में पहुंचते हैं, तो मुमकिन है कि उस इलाके का नाम 'सिविल लाइन्स' हो. भारत के दर्जनों शहरों में एक ही नाम का यह मोहल्ला कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासनकाल की सोची-समझी शहरी योजना का हिस्सा है.
रूलर्स और आमजन के बीच की लकीर

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ब्रिटिश काल के दौरान, शहरों को दो हिस्सों में बांटा गया था. एक तरफ 'केंटोनमेंट' होता था जहां सेना रहती थी, और दूसरी तरफ 'सिविल लाइन्स' बसाया गया. यह इलाका खास तौर पर ब्रिटिश नागरिक अधिकारियों (जैसे कलेक्टर, मजिस्ट्रेट और कमिश्नर) के रहने के लिए बनाया गया था. (AI इमेज)
सत्ता का प्रतीक

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इसे भारतीय बस्तियों की भीड़भाड़ और शोर-शराबे से दूर एक सुरक्षित और आलीशान 'एन्क्लेव' के रूप में डवलप किया गया था. यहां की ग्रिडनुमा सड़कें, बड़े अहाते वाले बंगले और कचहरी जैसे सरकारी भवन भारतीयों को यह अहसास दिलाते थे कि यहां से शासन चलता है. (AI इमेज)
हर जगह दोहराया

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उत्तर और मध्य भारत (उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश) में जैसे-जैसे अंग्रेजों ने नए जिले बनाए, उन्होंने 'सिविल लाइन्स' के इसी ब्लूप्रिंट को हर जगह दोहराया. 1947 में आजादी मिलने के बाद, इन इलाकों का स्वरूप बदलने लगा. ब्रिटिश अधिकारियों की जगह भारतीय नौकरशाहों ने ले ली. (AI इमेज)
अब भी हाई प्रोफाइल इलाके

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आज कई शहरों के सिविल लाइन्स इलाके हाई-प्रोफाइल आवासीय क्षेत्रों में बदल चुके हैं, तो कहीं ये कोचिंग सेंटर, कैफे और बुटीक मार्केट्स के बड़े कमर्शियल हब बन गए हैं. (AI इमेज)
पुरानी कहानी की याद दिलाती इमारतें

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हालांकि, आज भी यहां की चौड़ी सड़कें और औपनिवेशिक दौर की इमारतें हमें शहर के विकास की उस पुरानी कहानी की याद दिलाती हैं. (AI इमेज)