High Court Major Verdict on Asaram: जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेन्द्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने करीब एक महीने पहले सुरक्षित रखे गए निर्णय को सुनाते हुए स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. हालांकि, मामले में सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया.
आसाराम को करना होगा सरेंडर

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फिलहाल अंतरिम जमानत पर चल रहे आसाराम को अब कोर्ट के आदेश के अनुसार सरेंडर करना होगा. यह मामला अगस्त 2013 का है, जब जोधपुर के आश्रम में एक नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म का आरोप लगा था. लंबी सुनवाई के बाद 25 अप्रैल 2018 को विशेष पॉक्सो कोर्ट ने आसाराम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी.
बचाव पक्ष की दलील, मामला मनगढ़ंत

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हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई 16 फरवरी से 20 अप्रैल 2026 तक लगातार हुई, जिसके बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था. बचाव पक्ष ने दलील दी कि मामला मनगढ़ंत है और पीड़िता व उसके परिजनों के बयानों में विरोधाभास हैं. साथ ही कॉल रिकॉर्ड जैसे तकनीकी साक्ष्यों की कमी का हवाला भी दिया गया.
पीड़िता का बयान ही पर्याप्त साक्ष्य

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वहीं अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि पॉक्सो मामलों में पीड़िता का बयान ही पर्याप्त साक्ष्य होता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट भी मान्यता दे चुका है. अभियोजन ने यह भी कहा कि गवाहों पर हमले और संदिग्ध घटनाएं इस ओर इशारा करती हैं कि साक्ष्य मिटाने की कोशिश की गई. अंततः अदालत ने सभी तथ्यों और तर्कों पर विचार करते हुए सजा को बरकरार रखा, जिससे इस बहुचर्चित मामले में न्यायिक प्रक्रिया को एक महत्वपूर्ण मुकाम मिला.
गैंगरेप के आरोपों से हुए बरी

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इसी बीच, जोधपुर की बेंच ने उन्हें गैंगरेप और आपराधिक साजिश के आरोपों से बरी करके आंशिक राहत दी. पीठ ने कहा कि गैंगरेप और आपराधिक साजिश से संबंधित आरोपों को साबित करने के लिए रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत पर्याप्त नहीं हैं. गौरतलब है कि आसाराम अक्टूबर 2025 से चिकित्सा कारणों से अंतरिम जमानत पर बाहर हैं.
फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे

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फैसले के बाद सोलंकी ने कहा कि उच्च न्यायालय ने आसाराम की सजा पर रोक नहीं लगाई है और आजीवन कारावास की सजा अभी भी लागू है. उन्होंने यह भी कहा कि पीड़ित से परामर्श करने के बाद वे सह-आरोपियों के बरी होने के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करेंगे.