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अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण युद्ध ने पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई चेन को हिलाकर रख दिया है. भारत ने इस संकट से निपटने के लिए स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व में 53 लाख टन तेल जमा कर रखा है जिससे करीब 45 दिनों तक देश की जरूरतें पूरी हो सकती हैं.
खजाने की कीमत?

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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की मौजूदा कीमतों के हिसाब से भारत के इस सुरक्षित भंडार की कीमत अरबों डॉलर में आंकी जा रही है. यह तेल की वह अमानत है जिसे सरकार ने मुश्किल समय के लिए बचाकर रखा है ताकि वैश्विक स्तर पर दाम बढ़ने पर भी देश की रफ्तार न थमे.
कहां है तिजोरी?

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भारत ने अपना यह कीमती 'काला सोना' लोहे के टैंकरों में नहीं बल्कि पहाड़ों के सीने को चीरकर बनाई गई विशाल गुफाओं में स्टोर किया है. यह भंडार विशाखापत्तनम, मैंगलुरु और पडुर की अभेद्य सुरंगों में सुरक्षित रखा गया है जिसे विशेष परिस्थितियों में ही इस्तेमाल किया जाएगा.
क्यों पड़ी जरूरत?

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साल 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान भारत के पास केवल 3 दिन का तेल बचा था और तेल खरीदने के लिए जरूरी डॉलर भी खत्म हो गए थे. उसी सबक से सीख लेते हुए सरकार ने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बनाने का फैसला किया ताकि भविष्य में देश कभी ऐसी लाचारी का सामना न करे.
चट्टानें क्यों चुनीं?

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जमीन के ऊपर बने टैंक दुश्मन के हवाई हमले या मिसाइल अटैक में आसानी से तबाह हो सकते हैं लेकिन सैकड़ों फीट मोटी चट्टानों के नीचे तेल पूरी तरह सुरक्षित रहता है. ये गुफाएं ग्रेनाइट और बसाल्ट जैसी चट्टानों से बनी हैं जिससे तेल का रिसाव नहीं होता और परमाणु हमले का असर भी नहीं पड़ता.
भविष्य का प्लान?

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भारत सरकार अब मिशन 2.0 के तहत ओडिशा के चंडीखोल और पडुर में अपनी तेल भंडारण क्षमता को दोगुना करने पर काम कर रही है. इन नए भंडारों के तैयार होने के बाद भारत की ऊर्जा सुरक्षा और भी ज्यादा मजबूत हो जाएगी जिससे बाहरी युद्धों का असर देश पर न्यूनतम होगा.