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8वें वेतन आयोग की बैठकों में कर्मचारी यूनियनों ने बड़ा प्रस्ताव रखा है. उनका कहना है कि अब हर 10 साल की बजाय 5 साल में सैलरी रिवीजन होना चाहिए. महंगाई और रोजमर्रा के बढ़ते खर्चों को देखते हुए ये मांग तेजी से जोर पकड़ रही है.
क्या है 8वां वेतन आयोग?

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8वां वेतन आयोग केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनर्स की सैलरी, भत्ते और पेंशन में बदलाव तय करने के लिए बनाया गया है. इसका मकसद कर्मचारियों की इनकम को मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के मुताबिक अपडेट करना है. ये आयोग अभी परामर्श और सुझाव लेने के फेज में है.
अब 5 साल में सैलरी रिवीजन की मांग

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कर्मचारी यूनियनों ने मांग की है कि वेतन आयोग हर 10 साल की बजाय हर 5 साल में लागू होना चाहिए. उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था आज के समय के हिसाब से पुरानी हो चुकी है और इसमें बदलाव जरूरी है.
महंगाई बनी सबसे बड़ी वजह

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यूनियनों का कहना है कि 10 साल का अंतराल बहुत लंबा है, जिससे महंगाई की वजह से कर्मचारियों की रियल इनकम कम हो जाती है. अगर हर 5 साल में सैलरी रिवीजन होगा तो इनकम पर महंगाई का असर कम पड़ेगा.
निजी और बैंकिंग सेक्टर से तुलना

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कर्मचारी नेताओं ने बताया कि बैंकिंग और कई सरकारी प्रोजेक्ट्स में सैलरी हर 5 साल में रिवाइज होती है, जबकि प्राइवेट सेक्टर में ये अवधि 3 साल तक की होती है. ऐसे में सरकारी कर्मचारियों को पीछे नहीं रहना चाहिए.
DA बढ़ोतरी क्यों नहीं है काफी?

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हालांकि सरकार हर साल महंगाई भत्ता (DA) बढ़ाती है, लेकिन यूनियनों का कहना है कि ये बढ़ोतरी जीवनयापन के बढ़ते खर्च को पूरी तरह कवर नहीं कर पाती. इसलिए बड़ा वेतन संशोधन जरूरी है. उदाहरण के तौर पर, एक कर्मचारी की सैलरी 10 साल में लगभग दोगुनी ही हो पाती है, जो कि प्राइवेट सेक्टर की तुलना में काफी धीमी मानी जा रही है. यूनियन का मानना है कि इससे सरकारी नौकरियों का आकर्षण भी कम हो सकता है.
(All Photos Credit: Social Media)