जब भी आप किसी बैंक में अपना नया सेविंग्स अकाउंट (Savings Account) खुलवाते हैं, तो बैंक आपके सामने एक शर्त रखता है— खाते में एक तय न्यूनतम राशि यानी मिनिमम बैलेंस बनाए रखना. अगर आपके खाते में पैसा उस तय सीमा से कम होता है, तो बैंक आपसे पेनाल्टी या जुर्माना वसूलना शुरू कर देते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बैंक ऐसा क्यों करते हैं? और क्या आपको पता है कि देश के कई बड़े सरकारी बैंकों ने अपने ग्राहकों को राहत देते हुए इस झंझट को पूरी तरह से खत्म कर दिया है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं मिनिमम बैलेंस का पूरा खेल और उन बैंकों की लिस्ट जहां आपको ₹0 बैलेंस रखने पर भी कोई जुर्माना नहीं देना होगा.
आखिर क्या होता है मिनिमम बैलेंस? क्यों जरूरी है इसे समझना?

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सेविंग्स अकाउंट के इस सबसे बुनियादी नियम को जानना हर खाताधारक के लिए जरूरी है। मिनिमम बैलेंस वह न्यूनतम रकम है जो किसी बैंक के नियम के अनुसार आपको अपने खाते में हमेशा बनाए रखनी होती है। यह राशि हर बैंक में अलग-अलग हो सकती है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपका खाता किस प्रकार का है और बैंक आपको उसके साथ कौन-कौन सी मुफ्त सुविधाएं दे रहा है।
जेब पर क्यों चलती है कैंची? बैंक क्यों वसूलते हैं मिनिमम बैलेंस का चार्ज?

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बैंकों द्वारा मिनिमम बैलेंस न रखने पर जुर्माना लगाने के पीछे कई व्यावहारिक और वित्तीय कारण होते हैं। आज के समय में बैंक आपको एटीएम (ATM), मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग और कस्टमर सपोर्ट जैसी ढेरों डिजिटल और फिजिकल सुविधाएं देते हैं। बैंकों को अपने दफ्तरों का रख-रखाव करना होता है, स्टाफ को सैलरी देनी होती है और डिजिटल सर्विसेज को बिना किसी रुकावट के चलाने के लिए भारी खर्च करना पड़ता है। आपके खाते को मैनेज करने में आने वाले इसी खर्च को पूरा करने के लिए बैंक यह चार्ज वसूलते हैं।
दो तरह से मापा जाता है बैलेंस, सरकारी बैंकों ने दी बड़ी राहत!

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आमतौर पर ग्राहकों को दो अलग-अलग तरीकों से अपने सेविंग्स अकाउंट में मिनिमम बैलेंस को मेंटेन करना पड़ता है। पहली व्यवस्था के तहत खाते में हर दिन (Daily) एक निश्चित रकम होनी चाहिए, जबकि दूसरी व्यवस्था में पूरे महीने का औसत बैलेंस (Monthly Average Balance) देखा जाता है। ग्राहकों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए देश के कई बड़े सरकारी बैंकों ने इस अनिवार्य मिनिमम बैलेंस के नियम को अपने सामान्य खातों से पूरी तरह हटा दिया है।
सैलरी अकाउंट और प्राइवेट बैंक: कंपनी बदलते ही बदल जाता है नियम

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अक्सर लोग नौकरी बदलने के बाद अपने पुराने बैंक खातों पर ध्यान नहीं देते, जिससे उन्हें बाद में नुकसान उठाना पड़ता है। कई बड़ी कंपनियां बैंकों के साथ टाई-अप करती हैं, जिसके तहत कर्मचारियों के 'जीरो बैलेंस' सैलरी अकाउंट खोले जाते हैं। जब कोई कर्मचारी अपनी कंपनी बदलता है, तो नई कंपनी दूसरे बैंक में नया सैलरी अकाउंट खुलवा देती है. ऐसे में पुराना सैलरी अकाउंट खुद-ब-खुद एक सामान्य सेविंग्स अकाउंट में बदल जाता है। सामान्य सेविंग्स अकाउंट बनते ही उस पर बैंक के मिनिमम बैलेंस के नियम लागू हो जाते हैं। यदि उस खाते में पैसे नहीं हैं, तो प्राइवेट और अन्य बैंक चुपके से जुर्माना लगाना शुरू कर देते हैं। इसलिए पुराने अनुपयोगी खातों को या तो बंद कर दें या उनमें जरूरी बैलेंस बनाए रखें।