अभिषेक मेहरोत्रा
ग्रुप एडिटर डिजिटल, न्यूज24
14 फरवरी को क्या होता है? इस सवाल का जवाब अधिकांश लोगों के पास होगा। उनके पास भी जिन्हें इसमें विश्वास है और उनके पास भी जो इन सब में यकीन नहीं रखते। लेकिन 27 फरवरी का दिन इतिहास में किसलिए दर्ज है, इसके जवाब से अधिकांश लोग परिचित नहीं होंगे? इस सच्चाई के बावजूद कि 14 फरवरी की परंपरा विदेश से आयात की हुई है जबकि 27 फरवरी का इतिहास हमारे देश के एक महान नायक से जुड़ा है।
छोटी सी उम्र में देश की आजादी में बड़ा योगदान देने वाले चंद्रशेखर आजाद 27 फरवरी के दिन शहीद हुए थे। चंद्रशेखर आजाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों ने घेर लिया था। वह अंग्रेजों के हाथ जिंदा नहीं आना चाहते थे इसलिए उन्होंने 27 फरवरी 1931 को अपनी ही पिस्टल से खुद को गोली मार ली। चंद्रशेखर आजाद हमारे देश की आजादी के हीरो थे, मूंछों को ताव देते हुए उनकी तस्वीर, उनके साहसिक और प्रेरक विचार आज भी जोश का संचार करने की क्षमता रखते हैं। लेकिन ऐसा लगता है जैसे उस ‘क्षमता’ का अनुभव आज कोई नहीं करना चाहता।
युवा पीढ़ी वेलेंटाइंस डे जैसे आयोजनों तक सीमित होकर रह गई है। 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे चुनिंदा मौकों पर उसमें देशभक्ति की भावना दिखाई देती है, लेकिन इस भावना को जाहिर करने की स्थिति में देश कैसे पहुंचा उसे जानने में शायद उसे कोई दिलचस्पी नहीं है। सरकारी स्तर पर भी इस दिशा में कुछ खास नहीं किया जाता। छोटे-छोटे आयोजनों पर झोलीभर के विज्ञापन जारी करने वालीं सरकारों की चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि पर ‘कंजूसी’ तो यही इशारा कर रही है।
समस्या वेलेंटाइन डे या विदेशों से आयातित किसी दूसरी परंपरा के पालन में नहीं है। भारत एक आजाद देश है, यहां विचारों की स्वतंत्रता है। जिसे जो अच्छा लगता है, उसे करने की आजादी है। लेकिन इस आजादी के लिए जिन नायकों ने अपना खून बहाया, क्या उन्हें याद रखना हमारा धर्म नहीं? किसी महान शख्सियत को याद रखने के लिए किसी पर जबरन दबाव नहीं बनाया जा सकता और न ही इसके लिए लोगों को मजबूर नहीं किया जा सकता कि वे चंद्रशेखर आजाद या दूसरे शहीदों को श्रध्दांजलि अर्पित करें। हां, पर उनके महान कार्यों का प्रचार-प्रसार किया जा सकता है। उसके बारे में लोगों को जागरुक किया जा सकता है और यह दायित्व सरकार, सामाजिक संगठनों और देश के चौथ स्तंभ को निभाना चाहिए।
आजादी का महत्त्व क्या होता है, यह हर उस व्यक्ति को पता है जिसने कभी समाज, कभी परिवार या कभी किसी और वजह से अपनी इच्छाओं, अपने विचारों का दमन किया। ऐसा लगभग हर किसी के साथ कभी न कभी होता है। हम सभी आजादी के महत्व से परिचित हैं, हमें यह भी पता है कि आजादी आसानी से नहीं मिलती। तो फिर हम उन नायकों को कैसे भूल सकते हैं, जिन्होंने हमारे पूर्वजों के लिए, देश के हर नागरिक के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी?
चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि पर वैचारिक नीरसता, हम सबकी एक भारतवासी के तौर पर सामूहिक विफलता है।