संसद में महिला आरक्षण अधिनियम और परिसीमन विधेयक जैसे अहम संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए भाजपा ने बड़ा दांव खेला है. सूत्रों के मुताबिक, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने एनसीपी के दोनों गुटों – सुनेत्रा पवार वाली एनसीपी और और शरद पवार की एनसीपी के विलय और उन्हें एनडीए में शामिल करने का फॉर्मूला सुझाया है. भाजपा दोनों में से किसी भी एक गुट का भाजपा में विलय नहीं चाहती, बल्कि दोनों गुटों को एक करके एनडीए का हिस्सा बनाना चाहती है.
भाजपा का मानना है कि अगर एनसीपी के दोनों गुट एक होकर अलग पार्टी बने रहते हैं तो महाराष्ट्र में गैर-ब्राह्मण और मराठा वोटों को एकजुट करने में मदद मिलेगी.
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भाजपा का क्या है ऑफर?
इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में लिखा है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने दोनों गुटों के बीच पावर बैलेंस बनाए रखने के लिए एक बड़ा ऑफर दिया है. अगर शरद पवार और सुनेत्रा पवार के दोनों गुट एक होने के लिए राजी हो जाता हैं तो नई NCP को केंद्र सरकार में दो केंद्रीय कैबिनेट मंत्री पद दिए जाएंगे.
कहां फंसा है पेंच?
हालांकि, इस प्लान को लेकर अभी शुरुआती बातचीत ही हुई है. अभी इसके अंतिम रूप नहीं दिया गया है. अभी अजित पवार वाली एनसीपी में अंदरूनी कलह चल रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार और उनके बेटे पार्थ पार्टी के कुछ पुराने दिग्गजों से नाराज चल रहे हैं. उनकी नाराजगी की वजह प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे की मंगलवार को हुई मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलने मुलाकात है. इस बैठक में शरद पवार गुट के कद्दावर नेता जयंत पाटिल भी पहले से मौजूद थे.
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रिपोर्ट्स के मुताबिक, अजित पवार के बड़े बेटे और राज्यसभा सांसद पार्थ पवार चाहते हैं कि उनकी मां सुनेत्रा पवार को महाराष्ट्र सरकार में वित्त मंत्रालय मिले. यह मंत्रालय पहले अजित पवार के पास था, उनकी मौत के बाद देवेंद्र फडणवीस इस मंत्रालय को संभाल रहे हैं. इसके साथ ही चाहते हैं कि अगर दोनों गुट एक होते हैं तो पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनेत्रा पवार ही बनें.
सूत्रों का कहना है कि अगर सुनेत्रा गुट कैबिनेट पद, महाराष्ट्र में वित्त मंत्रालय और पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तीनों पर अड़ा रहा, तो शरद पवार गुट विलय के लिए राजी नहीं होगा.
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क्यों जरूरी है BJP के लिए यह नंबर गेम?
एनसीपी के एनडीए में आने से नरेंद्र मोदी सरकार संसद में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के और करीब पहुंच जाएगी, जो संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए बेहद जरूरी है. इन दोनों बिलों को पास कराने के लिए अप्रैल में सरकार ने एक विशेष सेशन बुलाया था. लेकिन सरकार इन्हें पारित कराने में नाकाम रही. लेकिन उसके बाद से विपक्षी दलों के 37 लोकसभा और राज्यसभा सांसद पाला बदल चुके हैं.
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अभी लोकसभा की ताकत 540 है, जहां दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा होता है 360 वोट. अप्रैल में एनडीए के पास 293 सांसद थे, जो टीएमसी और शिवसेना (UBT) में टूट के बाद बढ़कर 319 हो गए हैं. अगर शरद पवार की एनसीपी भी इस बिल का समर्थन करती है, तो एनडीए का आंकड़ा 327 तक पहुंच जाएगा, जो दो-तिहाई के जादुई आंकड़े से महज 33 सीट दूर रहेगा.
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